शुक्रवार, सितंबर 01, 2017

कल चिराग जैन जी की वॉल पर कवि सम्मेलन के वर्तमान परिदृश्य को लेकर बड़ी ज़रूरी चर्चा पढ़ी!इस पोस्ट का मन्तव्य था जो मुझे लगा कि साहित्य का दूसरा खेमा मंचीय कविता को  नकारता है और उसका कारण कवि सम्मेलनों में बढ़ती स्तरहीनता है लेकिन सारे मंच और सारे कवि ऐसे नहीं तो सब को एक ही तौर से देखना ज्यादती है!

मेरा भी यही मानना है कि हर मंच इस तरह की वृत्तियों से दूषित हो ऐसा नहीं है !आज भी बहुत से ऐसे मंच हैं जहाँ कविता अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप में विराजित होती है!

अभी दो तीन महीने पहले मेरा एक लंबा आलेख  भोपाल से प्रकाशित पत्रिका 'गीत गागर' में आया था!'आज के कवि सम्मेलन बहस और विमर्श की ज़रूरत'!अगले अंक में चिट्ठी पत्री वाले स्तम्भ में आलेख की सराहना पढ़ने को मिली,पाठकों के फोन कॉल्स भी आये!
फेसबुक पर पत्रिकाओं में छपने की ख़बरें कम ही शेयर करती हूँ इसीलिए ये भी नहीं की !लेकिन इस आलेख को शेयर न करने का एक कारण ये भी था कि निश्चित तौर पर मैं इस आलेख के कुछ अंश डालती,अपने विचार रखती और मुझे यक़ीनन यहाँ भी समर्थन मिलता, लेकिन इससे हासिल क्या होता?
क्यों कि जब तक ऐसे लेख,चर्चाओं,बहस में रखे गए विचारों को प्रयास कर अमल में न लाया जाए तब तक ये सब बेमानी हैं!
आज अपना ये लेख इस उम्मीद के साथ शेयर कर रही हूँ कि अब बहुत हुआ!कवि सम्मेलन कविता को जनता से जोड़ने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है ,इसे नदी को निर्मल और निर्बाध रखने की ज़िम्मेदारी कवि सम्मेलन के आयोजन जुड़े सभी लोगों की है!

!! आज के कवि सम्मेलन ,बहस और विमर्श की ज़रूरत!!

हिंदी कवि सम्मेलन  का  मंच उस धारा को पोषित करता है जिसमें भागी दारी कर श्रोता मनोरंजन,विचारशक्ति ,भाषायी समझ ,ज़हनी ख़ुराक पाता है !कवि सम्मेलन के इतिहास में वो स्वर्णिम क्षण शामिल हैं जब कवि सम्मेलनों ने जनता को जागरण की मशाल थमाई ,जीवन के प्रत्येक पहलुओं को कविता के रसमयी वाचन से परत दर परत समझना,जानना,बरतना बतलाया ,इसीलिए कवि सम्मेलन के पास अपने इतिहास की समृद्धि है !

कवि सम्मेलन  अपने सृजनात्मक हुनर को सधे  ढंग से पूरी तैयारी के साथ प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण प्लेटफॉर्म है !जनमानस द्वारा स्वीकृत इस मंच पर जहाँ सिर्फ कविता सुनाना  ही काफी नहीं होता बल्कि उसे इस तरह पेश किया जाना कि वो अवाम तक पूरी तरह सम्प्रेषित हो भी उतना ही ज़रूरी है !

पुराने वक़्त में शासक वर्ग ने कविता को आम आदमी से दूर रखने का कुत्सित प्रयास किया वही काम आज अकादमियां कर रही हैं ,गद्य कविता को ऊँचा स्थान देकर उसे साहित्य के उच्चतम पुरस्कारों से नवाज़ा जाता है और पद्य कविताओं को हीन दृष्टि से देखा जाता है !कविता जितनी क्लिष्ट होगी उतनी उत्कृष्ट ये उनकी मान्यता है ऐसा लगता है ! कविता खेतों में न गूंजे ,असहायों की आवाज़ न बने ,भौरों का गुंजन न बन सके ,संकरी पगडंडियों के सफर को आसान न बना सके लेकिन बुद्धिजीवियों से लैस विचारगोष्ठियों के कक्ष में विराजित हो , उस पर शोध प्रबंध रचे जाएँ उनके इन प्रयोजनों को कवि सम्मेलन  जैसे जनता के बीच होते रहने वाले आयोजनों ने पूरी तरह सफल नहीं होने दिया।कविताओं  का गरिष्ठ और क्लिष्ट होना उत्कृष्ट रचना का पर्याय नहीं ! ऐसी कविता भी क्या जो ज़िन्दगी के,मन के असलियत के क़रीब न हो !

 कविसम्मेलन ने कविता को आम जनता तक पहुँचाया ,उन्हें मनोरंजित किया !कवि  सम्मेलन  एक रात का वो जागरण हुआ करता है जो श्रोताओं के मनकक्ष  को आलोकित करता है फिर सोचिये कितनी ज़िम्मेदारी और ईमानदारी की ज़रुरत हैं इस प्रयोजन के लिए !  यहाँ पढ़ी जाने वाली रचना अनगिनत तजर्बों से गुज़रती है यहाँ आपके रचन की परख होती है ! एक समर्पित अदबी किसी भी ज़रिये से अवाम को खुश करने के लिए फ़िक्र के रख रखाव को नज़रअंदाज़ नहीं करता है ,कविता को तत्कालित वाहवाही  के लिए हल्का नहीं बनाता  है !सपाटपसंद दिमाग़ से तालमेल बिठलाने की कोशिश नहीं करता है !
३०-४० साल पहले के कविसम्मेलन और मुशायरों में और आज के कविसम्मेलन और मुशायरों में खासा फ़र्क़ आया  है !कविसम्मेलन मेट्रो सिटीज़ में होते हैं ,गाँव, क़स्बों में ,मेलों में ,एकेडमीज़ में ,रेडियो,टेलीविज़न ,शिक्षण संस्थान में !जिस तरह स्थान अलग अलग उसी तरह ज़हन भी अलहदा ! जगह और ज़हन के अनुसार कवियों का चयन ,कविताओं का स्तर भी बदल जाता है ! कही कहीं ऐसे कवि भी बुलवा लिए जाते हैं जिनका साहित्य से कोई वास्ता नहीं होता लेकिन विशिष्ट प्रस्तुतीकरण के साथ हलकी रचनाओं को जनता तक सम्प्रेषित करने में ये सिद्धहस्त होते हैं!

 वास्तविकता तो ये है की मंच वो ज़मीन  है जिसके अंतर पर लहलहाए शज़र सी कवितायें श्रोताओं को विचार पुष्प  उपहार देती है  जिससे उनका मानस सुगन्धित होता है ,लेकिन आज स्तिथि बिलकुल विपरीत है अपनी कमज़ोर कविता को ताकतवर चुटकुलों के रेपर में लपेट कर या किसी दूसरे कवि की उत्कृष्ट रचनाओं को अपने काव्यपाठ के बीच बीच में उद्घृत कर खुद को मंच के सफल कवि के रुप पेश किये जाने के उपक्रम की किसी से पर्दादारी नहीं है !सरस्वती के मंच पर द्वअर्थी संवाद,भद्दे चुटकुले,अशालीन नोंकझोंक का प्रपंच,धार्मिक उन्माद से लबरेज़ कविताओं द्वारा जनता से तालियों के रूप में त्वरित प्रति क्रिया पाकर कविसम्मेलन को सफल करा देने का दम्भ पाले,कुछ कवियों ने आज मंच को दूषित बना दिया है !कविसम्मेलन के मंच को स्वस्थ आवो हवा देने के लिए कविसम्मेलन  संयोजकों को भी अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी !

दरअस्ल मंच एक काव्यपत्रिका के अंक की तरह है जिस में व्यंग,गीत,हास्य,ग़ज़ल जैसे  संस्करण मौजूद रहते हैं सभी संस्करण अपने रस का निष्पादन करें तभी उसे  एक ईमानदार अभिव्यक्ति कहेंगे! लेकिन हास्य रस के अलावा अन्य रस के कवि भी  तालियों की चाहत के लिए अशालीन हास्य का सहारा लेने से नहीं चूकते ,हास्य को साथ लेना बिलकुल बुरा नहीं है !मुस्कुराहट के पल ज़िंदगी को ज़िंदगी बनाते हैं  लेकिन जनता इस रस के वास्तविक स्वरूप यानि शालीन और मनोरंजक से सिक्त हो ये शर्त होनी चाहिए ! अगर कवियों से  मंच पर उनके फूहड़ हास्य या अति साधारण शिल्प की या  उन्मादी कविताओं के सन्दर्भ में  सवाल किये जाएँ तो अक्सर यही उत्तर सुनने को मिलता है की जनता यही सुनना चाहती है मनोविनोद चाहती है ,अगर हम श्रोताओं को अपनी कविताओं के माध्यम से  ज़िंदगी की मुश्किलात से थोड़ी देर को दूर ले जाएँ तो क्या गलत है ? बिलकुल गलत नहीं है लेकिन मेरी नज़र में कविता मनोविनोद के साथ  मनोचिकित्सक का काम भी करती है ,मन की पीड़ाओं को हरना,विचार शक्ति सौंपना ,नए और सार्थक नज़रिये देना कविताओं से मनोचिकित्सा करना ही तो है !और ऐसे वक़्त में तो कवियों की ज़िम्मेदारी और ज़्यादा बढ़ जाती है जब जीवन से मानवीयता,संवेदनशीलता,सुकून,प्रेम ,अपनेपन का प्रतिशत लगातार घट रहा हो ! ज़माना सायबर युग का है एक दशक पहले कविता को यात्रा करते करते बरस बीतते थे आज पल भर में आप का कहन लाखों लोगों के बावस्ता हो जाता है साथ ही साथ आपकी छोटी सी छोटी भाव-भंगिमाओं ,टिप्पड़ियों के ऑडियो-विडिओ विज़ुअल्स पल भर में सरक्युलेट हो जाते हैं !आज का वक़्त पल-पल को दर्ज़ कर लेने वाला है !

एक रचनाकार  का फ़र्ज़ है कि वो अपनी कविता के उच्च स्तर तक श्रोताओं के कानों और ज़हनो को तैयार करे न कि जनता के  ज़हनों के अनुरूप अपनी रचनाओं को ढाल ले ! हालात के, वक़्त के तक़ाज़े  साहित्य को रास्ता दिखाएँ ये बिलकुल उलट बात है !मंच पर कविता के गिरते स्तर का एक मुख्य कारण ,साहित्य के महनीय व्यक्तित्वों जिनकी उपस्तिथि काव्यमंचों का गरिमामयी होना है उनकी खामोशियाँ भी हैं ,जो चल रहा है चलते रहने दिया जाये  जैसी उदासीनता भी है !कवि सम्मलेन की अंदरूनी दुनिया भी विवादों और राजनीति की  शिकार है !

लेकिन हर मंच इस तरह की वृत्तियों से दूषित हो ऐसा भी नहीं है !आज भी बहुत से ऐसे मंच हैं जहाँ कविता अपने सर्वश्रेष्ठ स्वरूप में विराजित होती है!

चूँकि आज कवि सम्मलेन पूरी तरह से कमर्शियल हो चुका है इसीलिए काव्य आयोजनों में कवि को मंच पर जनता द्वारा स्वीकृत किया जाना बहुत ज़रूरी है यानि आज एक कवि को परफ़ॉर्मर होना भी बहुत ज़रूरी है। कभी-कभी ऐसा होता है कि बढ़िया से बढ़िया रचनाओं को अच्छी तरह से प्रस्तुत न किये जाने की वजह से कवि अपने सरोकारों और अपनी रचना के उद्देश्य को जनता तक नहीं पहुंचा पाते वहीं अच्छे परफॉर्मर बेकार सी बेकार कविताओं को भी अपने बढ़िया प्रस्तुतीकरण से और बार बार तालियां बने के आग्रह करके जनता से  वाह वाही पाकर खुद को सफल साबित कर जाते हैं !आप अच्छे परफॉर्मर हैं लेकिन अच्छे कवि नहीं ,या अच्छे कवि हैं लेकिन अच्छे परफॉर्मर नहीं ये समीकरण भी ठीक नही !मेयारी कविताओं को अच्छे प्रस्तुतिकरण से जनता तक पहुँचना कवि सम्मलेन की सफ़लता है !हालांकि ये भी सत्यता है श्रोता भी ऐसी गैर मेयारी कविताओं पर तात्कालिक वाह वाही  दे तो देते हैं लेकिन सम्मान उन्हीं को देते हैं जिनके पास वाक़ई मेयारी रचनाशीलता है ! 

कविता को जन जन तक पहुँचाने का माध्यम हैं पत्र पत्रिकाएं और  कविसम्मलेन , मुशायरे महफ़िलें। दोनों ही ज़रियों का अगर सम्यक विवेचन किया जाये तो दोनों ज़रियो की  पूर्वपीठिका के साथ-साथ युगीन परिस्थियों पर विमर्श प्राथमिक है लेकिन यहाँ इस तरह का मूल्यांकन नाममात्र को है अगर हैं भी तो सम्यक नहीं ,समग्र नहीं !कवि सम्मेलनीय कविता को आलोचना और समीक्षा के दायरे से हमेशा बाहर रखा गया, इस माध्यम का मूल्यांकन न होना वाक़ई दुर्भाग्य है !इस वजह से भी कविता से महरूम लेकिन फिर कवि कहाये जाने वालों की संख्या में इज़ाफ़ा होता रहा !ये ज़रूरी नहीं कि मेरे इस मत से इत्तेफ़ाक़ रखा ही जाये  लेकिन इतना तो सच है समय-समय पर कुछ बहसें,विचार गोष्ठी ज़रूर की जाएँ कि मंच पर कविता का स्वरूप है कैसा है ,कैसा था ,क्या होना चाहिए ! 
इस सिलसिले में मुझे मीर  का एक शेर याद आता है 'शेर मेरे हैं गो खवासपसन्द /गुफ़्तगू पर मुझे अवाम से है  ये शेर बड़ा मौजू है आज के  कविसम्मेलन मुशायरों के परिपेक्ष्य में ,अगर इस तरह का बैलेंस अगर मंच पर बना लिया जाए तो आज का मंच फिर वही गरिमा पा सकेगा, कवि कलम के प्रति ,श्रोता अपने ज़हन के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझे तो समस्या हल हो जाएगी ! विचारों का कोई निश्चित गंतव्य नहीं होता ,बस एक उचंग सी उठती है और वो उचंग ,वो धुआँ, वो विचलन मुनासिब शब्द पा जाएँ ,वही कवितायेँ अपना सफर पूरा कर पाती हैं !कवि होना बहुत बड़ा सौभाग्य है ,ईश्वर की बख़्शी अनमोल देन है इसका इस्तेमाल सही उद्देश्य से किया जाना चाहिए !
#सोनरूपा

रविवार, मार्च 26, 2017

अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये


मेरा ये ख़त घरेलू स्त्रियों के नाम!थोड़ा सा वक़्त निकाल लीजियेगा इसके लिए!

मेरी प्यारी सहेलियों,

बहुत दिनों से कुछ बताना चाहती थी या शायद कहना चाहती थी तुम सब से !
 मैंने अपने घर के अंदर बहुत से प्लांट्स लगा रखें हैं!ज़्यादातर ऐसे हैं जो पानी में भी ख़ूब पनपते हैं !कहीं- कहीं मैंने घर के कोने को एक गाँव सा रूप दे दिया है और वहाँ कुछ इनडोर प्लांट्स रख दिए हैं!कहीं गैस की चिमनी के कोने में छोटे छोटे मिट्टी के,पॉटरी के बर्तनों में पौधे पनपा दिए हैं!
मुझे कई बार ऐसा लगा है दरअसल ये हुआ भी है कि मैं दो-तीन दिन के लिए बाहर गयी और लौट कर आई तो देखा मेरे इन प्लांट्स में से कई के पत्ते पीले हो गए हैं जबकि मेरे पीछे इनकी देखभाल में कोई कसर नहीं रहती!
तब कई बार मैं सोचती हूँ क्या ये मेरे बिना अकेले हो जाते हैं इसीलिए मुरझा जाते हैं ?
मैं इनके पीले पत्ते अलग करती हूँ और इन्हें फिर से हरा भरा बना देती हूँ!

तुम सोचोगी ये भी कोई बात हुई,पौधे हैं मुरझायेंगे ही तुम्हारी याद थोड़ी करेंगे!

लेकिन तुम्हें पता है मैं अपनी इस सोच से ख़ूब ख़ुश होती हूँ और संतुष्ट भी वो इसीलिए कि मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपने घर के ज़र्रे ज़र्रे के लिए कितनी ज़रूरी हूँ! इतनी ज़रूरी कि ये पौधे भी मेरे बिन नहीं रह पाते!कितनी संतुष्ट सी हो जाती हूँ मैं ये सोचकर !हम स्त्रियों की ये संतोषी प्रवृत्ति स्त्री विमर्श के ख़ाके का एक कमज़ोर बिंदु माना जाता है लेकिन सच तो ये है यही हमारी ताक़त है!
ख़ैर जब मैं पौधों में ख़ुद का अस्तित्व स्वीकार लेती हूँ तो मैं अपने परिवार के लिए ख़ुद को कितना महत्त्वपूर्ण मानती होऊँगी ये आप अंदाज़ा लगा ही सकते हैं !दरअसल मैं मानती ही नहीं, मैं जानती हूँ कि अपने परिवार की केंद्रबिंदु हूँ !
एक पल के लिए भी ख़ुद को अपने घर से हटा कर देखती हूँ तो घर का ज़र्रा ज़र्रा मुझे पुकारता हुआ सा लगता है !

मेरी सहेलियों,
जब तुमसे कोई पूछता है कि आप क्या करती हैं?तुममें से ज़्यादातर कुछ इस तरह से कहती हैं कि हम तो हॉउस वाइफ़ हैं बस!

कई बार मैंने इस बस कहने में अनंत ख़ालीपन महसूस किया है तुममें!लगता है जैसे कि तुम्हारे हाउस वाइफ़ होने के कोई मायने ही नहीं!हाँ अक्सर ये होता होगा कि जब तुम्हारे पति तुमसे ये कहते होंगे 'आख़िर तुम करती ही क्या हो घर में,हमें देखो कितनी मेहनत करते हैं '!
कितनी बार ऐसा भी तुमने सुना होगा 'अरे जॉब क्यों नहीं की ?तुम तो पढ़ी लिखी थीं फिर भी घर बैठी हो'!

एक बात और याद आयी अभी एक भजन संध्या में मुझे अपनी एक परिचित मिलीं मैंने उनसे कहा 'भाभी जी, बड़े दिनों बाद दिखीं आप! वो बोलीं 'हाँ, ऐसे कहीं आ जाती हूँ या जब ये साथ हों तब कहीं चली जाती हूँ !किटी विटी इनको पसन्द नहीं इसीलिए ज्वाइन नहीं की! अब देखो सोना ,इनके विपरीत तो नहीं चल सकती न ,और ये कहते हैं कि एक बार औरत की ज़ुबान खुल जाए और क़दम घर से निकल जाए तो फिर वो रूकती नहीं '!ये कहते हुए उन्हें गर्व हो रहा था कि देखो कितनी पतिव्रता स्त्री हूँ मैं !मैं हैरान भी थी और दुःखी भी उनकी इस सोच पर !
ख़ैर ये तो उन स्त्रियों की बात है जो अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक नहीं हैं या कह लीजिये उनके अंदर वैचारिक शून्यता है !
लेकिन जो स्त्री अपने अस्तित्व को कहीं से कमतर नहीं मानती लेकिन परिस्तिथियाँ जहाँ उसका परिवार उसके घर के लिए किये गए काम या समर्पण को कोई महत्त्व नहीं देता या समाज की सोच कि 'हाउस वाइफ़ से एक कामकाजी स्त्री थोड़ी ज़्यादा सुपीरियर है' उसे अंदर ही अंदर कुंठाग्रस्त बना देती हैं !परिणामस्वरूप उसकी सोच ये हो जाती है 'हम तो हाउस वाइफ़ हैं बस'!
स्त्री चाहें कामकाजी हो या हाउस वाइफ,ग्रामीण हो या शहरी,संपन्न परिवार की हो या अन्य स्तर के परिवार की! दरअसल हर क्षेत्र में,हर रूप में वो आज भी पुरुषों से कमतर आँकी जाती है!
स्वतंत्र होकर भी परतंत्र,निरीह,वंचित,शोषित!

इस विषय पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है बहुत कुछ सुझाया जा सकता है लेकिन आज मैं अपनी जिन सहेलियों से मुख़ातिब हूँ ये वही हैं जो समाज की सबसे प्राथमिक इकाई यानि परिवार को सुदृढ़ नींव देती हैं ,एक मकान को घर बनाती हैं ,एक पुरुष की अर्धांगनी बनकर उसे पूर्ण बनाती हैं,अपनी कोख़ से उसका और अपना अंश जन्मती हैं !

मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मैं एक ऐसे परिवार में ब्याही हूँ जहाँ स्त्रियों पुरुषों में कोई अंतर नहीं!पति को ख़ुद से सुपीरियर समझने का कोई चलन नहीं हमारे यहाँ !मैंने अपनी ख़ुशी से नौकरी नहीं की,मुझे नहीं करनी थी इसीलिए नहीं की !मेरे पति कूपमंडूक नहीं, कभी नहीं कह सकते कि तुम करती क्या हो घर में,या तुमने किया ही क्या है आख़िर ,मुझे देखो मैं कितना कुछ करता हूँ....इस तरह का कुछ!

लेकिन यदि इस तरह का कोई भी प्रश्न या हालात मेरे सामने आते हैं! तो मुझमें माद्दा है कि मैं बता, जता सकूँ कि मैं कितनी ज़रूरी हूँ उनके लिए,परिवार के लिए!

लेकिन मेरी सहेलियों ऐसा जवाब आप तब दे पायेंगी जब आप स्वयं ख़ुद को स्वीकारेंगी!जिस दिन आपने ख़ुद को पहचान लिया,स्वीकार लिया फिर किसकी हिम्मत जो आपके वुजूद को हल्के में ले!
क्यों कि जहाँ रौशनी होती है फिर वहाँ सिर्फ़ रौशनी ही होती है!

अभी पिछले दिनों की ही तो बात है जब मुझे अपनी  एक दोस्त के अंदर एक घरेलू स्त्री होने की हीनता नज़र आई मैंने उस वक़्त उसे उसकी इम्पॉर्टेन्स हल्के फुल्के ढंग से बतलाई लेकिन उसी समय सोचा कि अपना मन फेसबुक पर ज़रूर साझा करुँगी क्यों कि मेरे जो पाठक हैं उनमें से कई स्त्रियाँ ऐसी होंगी जो इस तड़पन से गुज़र रही होंगी !
भारतीय समाज में ज़्यादा प्रतिशत ऐसी स्त्रियों का है जिनके होने को उतना स्वीकार नहीं किया गया जितना  किया जाना चाहिए था!

हमें पुरुष से बराबरी नहीं करनी,करनी भी नहीं चाहिए! पुरुष पुरुष है हम हम हैं !

एक कविता ने उसी दिन मेरे मन में जन्म लिया था जिस दिन अपनी दोस्त को उदास देखा था!उसे शेयर कर रही हूँ !

मेरी दोस्तों इसे पढ़ियेगा और उससे भी ज़्यादा गुनियेगा!

सभी स्त्रियों से मेरी ये गुज़ारिश!

आपकी
सोनरूपा

!!अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!!

सृष्टि का आधार हैं,संरचनाएँ हैं
जीवन की इंद्रधनुषी छटाएँ हैं
धूप में छाँव देने वाली प्रथाएँ हैं
त्याग,तप,शौर्य, धैर्य की कथाएँ हैं
रिश्तों को संजोने वाली सभ्यताएँ हैं
हम भोर सी पुनीत भावनाएँ हैं

इसलिए काम ये ज़रूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

ज़िन्दगी को जन्म देने के सुभागी हम
घर के ज़र्रे ज़र्रे के अनुरागी हम
प्रेम,त्याग,ममता के अनुगामी हम
मन की कठोरता के प्रतिगामी हम
चाँद पर भी क़दम रख आये हैं
हिम आलय की बर्फ़ चख आये हैं
गर्व ख़ुद पर बदस्तूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

नदिया की धार कभी मुड़ती नहीं
बेगवान वायु कभी रूकती नहीं
पर्वतों की श्रृंखलाएं झुकती नहीं
जोश भरी वाणी कभी घुटती नहीं
आप किसी से भी कमज़ोर नहीं हैं
आँसू भरे नयनों की कोर नहीं हैं

मन से समस्त भ्रम दूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

पिता,पति,पुत्र का प्रशासन सहें
भीतर भीतर रोज़ ख़ुद को दहें
कब तक सबके आदेशों को सुनें
ज़िन्दगी को अपने तरीक़े से जियें
बहुत हुआ ये शोषण का सिलसिला
क़िस्मत से न अब कीजिये  गिला

शिक्षा से ये अन्धकार दूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

अपने हितों के प्रति मुखर बनें
स्वाभिमान वाला नेक रास्ता चुनें
अपसंस्कृति की आग में न पिघलें
आत्मसंयम वाली न राह बदलें
सत्य है स्वछंदता स्वतंत्रता नहीं
इसकी आज़ादी से कोई समता नहीं

फ़ैसले करें तो बाशऊर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

शोकेस में रक्खी आप गुड़िया नहीं
मोम की बनी हुई गुजरिया नहीं
आँसू बहाती हुई बदरिया नहीं
लाज को ढोने वाली चुनरिया नहीं
आप गर सीता सती सा विचार हैं
आप रणचंडी का भी अवतार हैं

हौसलों को ऊँचा भरपूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!


सोनरूपा
22 मार्च


सोमवार, फ़रवरी 13, 2017

'यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है
कई झूठे इकठ्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है '

एक पत्रिका के लिए नामवर शायर 'हसीब सोज़'जी के ग़ज़ल संग्रह 'अपनी ज़मीन से' का मजमून(समीक्षा) लिखने का अवसर मिला!यहाँ भी शेयर कर रही हूँ!

!! हिंदुस्तानी ज़बान के शायर : हसीब सोज़!!

साहित्य की कोई भी विधा क्यों न हो उसने अपने समय की ज़िन्दगी को अपने-अपने तौर पर पेश किया है !

ज़माने के रंग ,तौर तरीक़े ,विसंगतियाँ ,दिल के जज़्बात की सटीक अभिव्यक्ति है हसीब सोज़ साहब की शायरी !

आत्मचिंतन और ख़ुद से मुठभेड़ के बाद उनकी कलम से निसृत शायरी वो वितान रचती है कि महसूस हो हाँ,यहाँ तो हमारे मन बात है !

एक कलमकार का सबसे बड़ा हासिल ये होता है कि वो अपनी शिनाख़्त हासिल कर ले !सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं ,सोशल साइट्स पर ग़ज़लें   पढ़कर कभी-कभी इक शाइर का ये मिसरा मन में कौंधता है-
’कब तलक सुनते रहें हम एक जैसी गुफ़्तगू’ 
लेकिन अगर हसीब सोज़ जी को पढ़ा जाए तो आप उनके संग्रह ‘अपनी ज़मीन से’ की पहली ग़ज़ल से लेकर आख़िरी ग़ज़ल तक बस हसीब सोज़ को ही पायेंगे किसी और का ध्यान भी आपके ज़ेहन के आसपास से नहीं गुजरेगा ! संग्रह की पीठ पर नामवर कवि,ग़ज़लकार प्रदीप चौबे जी की राय है जो हसीब सोज़ जी की शायरी पर बिलकुल सटीक है !

दरअसल अंतर्मन का नाद हो या बाहरी जीवन का कोलाहल ग़ज़ल को ग़ज़ल ही होना होता है! ग़ज़ल रेत सी ख़ुश्क नहीं,भावनाओं का पठार नहीं ये वो विधा है जिसमें मन की ध्वनियाँ हैं तो बाहरी समाज का कोलाहल भी और इन  सब के बीच इसमें लफ़्ज़ों की लोच ,हर्फों की बरतने का सलीका भी सध जाए तब ग़ज़ल ग़ज़ल होती है ! ग़ज़ल के शिल्प में जितनी शिल्प की बाध्यता ज़रूरी है उतना ही ज़रूरी कथ्य का बिम्बात्मक और प्रतीकात्मक प्रस्तुतिकरण!

कुछ शेर देखिये- 
मैं टाटा बिड़ला से आगे निकलना चाहता हूँ 
तू एक रात ठहर जा ग़रीबखाने में 

वो किस मज़े से हवा में उड़ा रहा है मुझे 
मैं एक बूँद हूँ दरिया बता रहा है मुझे 

किसी के साथ हमने वो भी दिन बरबाद कर डाले 
कि जब मिट्टी उठा लेते तो सोना हो गया होता

प्रख्यात कवि डॉ उर्मिलेश का कहना है ‘ग़ज़ल को अख़बार होने से बचाया जाए,ग़ज़ल का हर शेर अपने समय की ख़बर दे या उस ख़बर से हमें परोक्षत: ख़बरदार करे ,यह तो चलेगा लेकिन वह अख़बार की हद चला जायेगा तो वह शेर नहीं रह जायेगा’!
और हसीब सोज़ जी की शायरी की ख़ासियत है कि हर शेर अपने आप में एक पूरा कथानक है रवानगी नदी की लहर सी ,लफ़्ज़ों को बरतने का सलीक़ा कमाल का , कहीं सपाटबयानी नहीं !


रवायती शायरी अब गुज़रे ज़माने की बात है !लोग अब उर्दू-हिन्दी की डिक्शनरी खोलकर अर्थ खोजना नहीं चाहते !’शब्दों में किफ़ायत बरतने की कला ,कसापन,कम शब्दों में गहरी और असरदार बात और कोटेबल शेर’ इन मायनों में हसीब सोज़ जी की शायरी खरी उतरती है उनके कुछ शेर ख़ूब उद्घृत किये जाते हैं !उनके शेर आम आदमी की आवाज़ हैं !

तअल्लुक़ात की क़ीमत चुकाता रहता हूँ
मैं उसके झूठ पे भी मुस्कुराता रहता है 

तिरी मदद का यहाँ तक हिसाब देना पड़ा
चराग़ ले के मुझे आफ़ताब देना पड़ा 

बीड़ी  सिग्रेट के धुएँ भी ज़ाफ़रानी हो गये 
लोग दौलत की बदौलत ख़ानदानी हो गये 

ये रस्मी जुमला हमेशा रिपीट होता है 
हज़ार ख़ूबियाँ थीं आह मरने वाले में 

देख ले तेरी सख़ावत किस क़दर मशकूक है 
ये भिकारी भीक का बर्तन भी छोटा लाये हैं 

स्वार्थपूर्ति  हेतु अपने स्वाभिमान को ताक पर रख रास्ता बनाना ज़माने का शगल हो गया है ऐसे में सोज़ साहब की ग़ज़लों से गुज़रते हुए हम एक अना पसंद व्यक्तित्व से मिलते हैं-  

अगर शर्तों पे मिलता है तो दरिया छोड़ देता हूँ 
मैं अपने आप को हर रोज़ प्यासा छोड़ देता हूँ 
सामाजिक जीवन की विद्रूपताएँ देखिये -

शायद मुआफ़ पिछली ख़ताएँ नहीं हुईं 
मरने के बाद शोक सभाएं नहीं हुईं 

कोई कमाल था न हम में कोई ख़ूबी थी 
ये दुनिया कैसे हमारी मुरीद हो जाती 

आज ज़िन्दगी से सुकून के पल इस क़दर गुम हो रहे हैं कि स्तिथि ये हो जाती है – 

कहीं तनाव की सीमा न इतनी बढ़ जाए 
कि ख़ुदकुशी भी किसी रोज़ करनी पड़ जाए 
  
रात दिन सबको कोई काम लगा रहता है 
शहर में चारों तरफ जाम लगा रहता है

कुछेक शेर अलग रंग के भी पढ़िए जिन्हें पढ़ कर बरबस चेहरे पर मुस्कान आ जाती है –

कई दिनों के लिए उसको देख लेता हूँ 
वो इत्तिफाक़ से जब भी गली में मिलता है

हम तो इस शर्त पे भी देखने आये हैं तुझे 
अंधे हो जायेंगे जिस वक़्त नज़ारा होगा   

एक ज़िम्मेदार कलम स्व से सर्व की यात्रा तय करती है !हसीब सोज़ जी की शायरी ये ज़िम्मेदारी बखूबी निभाती है !वो पत्र पत्रिकाओं जितने चाव से पढ़े जाते हैं उतने ही मुशायरों में भी पसंद किये जाते हैं उनके यहाँ मंच और किताब में कोई फ़ासला नहीं !  
हिन्दी ग़ज़ल  उर्दू ग़ज़ल के झगड़े ने ग़ज़ल की आत्मा को आहत किया है और ऐसे में हसीब सोज़ जी की ग़ज़लों  का सुखद पहलू ये है कि उनका लहजा वो है जो हिन्दुस्तानी आवाम का लहजा है !अपनी ग़ज़लों के बारे में उनका जो कहना है वो मेरे लिखे जाने से ज़्यादा आपको उनका नज़रिया जानने का मौक़ा देगा –
‘अपनी ज़मीन से’ में अपनी शायरी के बाबत वो क्या कहते हैं पढ़िए –

‘लव लेटर में स्पेलिंग की नहीं बल्कि लफ़्ज़ों का अर्थ मायने रखता है ,शायरी की सच्ची तारीफ़ यही है कि कान सुने और दिल महसूस करे और ऐसा उस वक़्त संभव है जब दिल की बात दिल से कही जाए !हिन्दी शायरी –उर्दू शायरी ,यह दो ज़बानों का मतभेद नहीं बल्कि दो ज़हनों की अपनी ज़िद है !मेरे ख़याल में ये काम तब और भी आसान हो जाता है जब हम हिन्दुस्तानी ज़बान इस्तेमाल करें हिंदुस्तानी ज़बान का मतलब है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक बोली भी जाती है,समझी भी जाती है ,जिसकी पीठ पर न कोई हिन्दी का ठप्पा है न उर्दू का !आसान लफ़्ज़ों में अवामी गुफ़्तगू ही शायरी का सबसे बड़ा कमाल है !वह शेर ज़िन्दा रहता है जो याद रहता है’ !

और हसीब सोज़ जी की शायरी वाक़ई अपने हर पाठक को याद रह जाने वाले शायरी है और ये पाठक और रचनाकार दोनों की ही ख़ुशनसीबी है!

-सोनरूपा विशाल

【संग्रह के लिए सम्पर्क करें-हसीब सोज़-9720735172】

गुरुवार, जुलाई 21, 2016

कब तक ?

जब वी मेट’ फिल्म के सीन की तरह क्या हम कागज़ पर ख़ूब भद्दी भद्दी गालियाँ लिखें और उस काग़ज़ को फ्लश्ड आउट करके अपनी नाराज़गी को कम कर लें?या आश्चर्य करें इन कमज़र्फों पर जिनकी ज़बान को ताक़त देने वाली मांसपेशियाँ हमारे खून से बनी हैं !

बाहर अंदर ख़ूब शोर है एक पार्टी के सामान्य से नेता द्वारा दलितों की हितैषी कही जाने वाली एक पार्टी की महिला राष्ट्रीय अध्यक्ष के बारे में बेहद ख़राब टिप्पणी की वजह से !

आज दिन सूरज की गर्मी से कम इस घटनाक्रम के ख़िलाफ़ प्रदर्शन से ज़्यादा तपा !
गालियों का विरोध गालियों से !
तेरी माँ होती तो,तेरी बहन होती तो!
राजनीति की चालें हम समझते हैं लेकिन 
निशाना यानि हम यानि स्त्रियाँ !

क्यों भई?

निशाना यानि हम यानि स्त्रियाँ!

हम पर तीर चलाने वाला तीरंदाज़ कभी मायूस नहीं होगा क्यों हम वो शिकार हैं जो उसके दायरे में हमेशा से रहे हैं !चरित्रहीनता का सर्टिफिकेट तो स्त्रियों को सेकेंड्स में दे दिया जाता है!

अगर आपके वुजूद में राष्ट्रपति,मुख्यमंत्री,एस्ट्रोनोट,रेसलर,पायलट आदि जैसी उपलब्धियाँ शामिल होंगी तब कहा जायेगा कि 'ओहो....एक औरत होकर’ !

लेकिन अगर आप पितृसत्ता की अनुगामी हैं और उससे अलग कुछ भी सोचती या करती ,कहती हैं तो भी कहा जायेगा कि ‘ओहो एक औरत होकर’ !

क्यों हमेशा स्त्रियों का ही चीर हरण किया जाता है ?
क्यों स्त्रियों को ही परीक्षा देनी होती है ?
क्यों स्त्रियों को ही कटघरे में खड़ा किया जाता है ?


बहुत हुए ये घिसे पिटे सवाल जिनके जवाब जानते बूझते ये सवाल हम बार-बार पूछें तो हमसे बड़ा मजबूर कौन होगा लेकिन हम हैं ही ऐसे मजबूर !

ये है कुछ स्त्रियों के जीवन का ढंग -
हम पर अधिकार हैं न उपयोग किये जाने के लिए !
हम पर स्वतंत्रता है न स्वीकार किये जाने के लिए !
हम पर शक्ति है न पहचान पाने के लिए !

ये है कुछ स्त्रियों के जीवन का ढंग-
हम पर अधिकार हैं हम प्रयोग करते हैं !
हम स्वतंत्र हैं तो स्वतंत्र जीते हैं !
हम पर शक्ति है हम जानते हैं !


यानि कुछ के लिए अपना होना बेमायने है कुछ के लिए उनका अपना होने के मायने हैं !
लेकिन दोनों ही तरह के जीवन जीने वाली स्त्रियों पर आक्षेप पर कोई
भेदभाव नहीं !


हमारे घूँघट हटने से घर की लाज चली जाती है ,हमारी स्कर्ट की ऊँचाई पुरुषों को प्रोवोक करती है ,हमारा तेज़ आवाज़ में बोलना भी हमें  हमारी औकात से बाहर होने का सायरन है ,हममें और सजावटी वस्तु में कोई फर्क नहीं,आज भी हम दाँव पर लगा दिए जाते हैं !

अब मत बतलाइये कि हम क्या हैं अब बस करके दिखलाइये कि हम क्या कर सकते हैं !

अब वक़्त अपने अपराधी को अपराधी घोषित करवाए जाने का है, विरोध का है तब तक जब तक विरोध अपने विरोध का विरोध न करने लगे और हँसने का इन घटिया स्टेटमेंट्स पर उस हद तक जब तक बोलने वाला इतना शर्मिंदा न हो जाये कि उस पर ‘चुल्लू भर पानी में डूब मरो’ वाला मुहावरा फिट न हो जाए और उस एटीट्यूड को साधने का कि जहाँ बोल सको ‘जस्ट गो टू हेल,भाड़ में जाओ तुम और तुम्हारी बेहूदा सोच,हमें कोई फ़िक्र नहीं!

लेकिन ये पैराग्राफ सिर्फ़ खानापूर्ति न हो क्यों कि बात ख़त्म करनी है!बल्कि वाक़ई में ऐसा हो !
ऐसी आस विश्वास के साथ रखनी है!
मुझे और आपको !

सोनरूपा







   

  


शनिवार, जून 18, 2016

पल पल दिल के पास

'आंवला' हमारे यहाँ से 24 किलोमीटर दूर, हमारी बुआ जी का घर ! ऐसे ही तपन भरे दिन और उनके घर तक का रास्ता,और रास्ते में जामुन के ख़ूब सारे पेड़ और एक ज़िद उन पेड़ों के रखवाले से कि 'भैया हमसे पैसे ले लो लेकिन हमें अपने हाथों से जामुन तोड़ने दो '!

ऐसे ही हमारे घर के पास एक मस्जिद उसके पास लगे खट मिट्ठू दोस्त यानि आड़ू, शहतूत और इमली का एक-एक पेड़ और एक इंतज़ार 'कि कब ये पकें और कब हम खाएं'!

ऐसे ही बरेली के रास्ते पीले-पीले फूलों से संवरे कुछ पेड़ और एक चाह 'कि इनके साथ मुझे फ़ोटो क्लिक करवाना है ,मेरे सफ़ेद आउटफिट के साथ ये पीले फूल कितने अच्छे लग रहे हैं,इसका डी पी बहुत प्यारा लगेगा !

और आज घर से दिल्ली तक का सफ़र,घनी धूप में सड़क के दोनों ओर नारंगी छतरी से तने गुलमोहर के ख़ूबसूरत पेड़ और एक ख़ुशी' कि उफ़्फ़ कितने सुंदर'!

लेकिन फिर डर और फ़िक़्र कि ये भी कहाँ ज़्यादा दिन रहेंगे कि जैसे जामुन,पीले फूलों वाले पेड़,मेरे आड़ू,शहतूत और इमली के पेड़ काट डाले गए हमारी भौतिक सहूलियतों के लिए ! और यूँ भी मानसिक सहूलियतों की टूट फूट की मरम्मत के लिए हमारा मन ही कारीगर है !

अब वक़्त सुख को चिंता के साथ महसूस करने का है कि 'न जाने कब तक साथ रहें ये पल, ये नज़ारे'!
और
थोड़ा सा फ़िल्मी हो जाने का भी है'हर पल यहाँ जी भर जियो,जो है समां कल हो न हो'!

मंगलवार, जून 09, 2015

रिहाई

तनु नाम है उसका और उसकी माँ का नाम लता |जेल की महिला बैरक में जाने पर आज पहले की तरह उन्होंने मुझे सिर्फ़ अपनी ओर ध्यान देने के लिए ज़ोर नहीं दिया क्यों कि आज मेरे साथ पापा के नाम पर बनायी समिति के और भी मेम्बर्स थे |उन्होंने मुझे देखते ही बेहद ख़ुशी से हाथ हिलाया बस,फिर अपनी जगह जा कर बैठ गयीं|आज हम लोग महिला बैरक को एक टी वी उपहार के तौर पर देने गये थे |इससे पहले भी कुछ इसी तरह की वजहों से एक दो बार जेल आना हुआ  |

लगभग आठ साल पहले जब पहली बार मैं तनु और उसकी माँ से मिली तो उनका रवैया बहुत डरा देने वाला था |वो खा जाने वाली निगाह से हम सबको देख रही थीं | जो सामान हम लाये थे उन्हें एक दो  को छोड़ कर सभी महिला कैदियों ने मन से ले लिया था | तनु ने हमसे कहा कि हम कोई ऐसे वैसे नहीं हैं जो ये भीख लें |मैंने कहा' ये कोई भीख़ नहीं है ये तो हम आपसे मिलने आये तो बस थोड़ा कुछ.....उनके चेहरे के हाव भाव देख कर मैं चुप हो गयी| मैं महसूस कर पा रही थी कि उनके आत्म सम्मान को ठेस लगी है |वो ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहीं थीं ‘हम बेगुनाह हैं’ आँखों से जैसे आँसुओं की जगह गुस्सा बह रहा था |मेरा हाथ उन्होंने कस के पकड़ लिया था और कई पन्नों में लिखा कुछ मेरी ओर किया और बोलीं ‘इसे पढ़िए इसमें सब सच लिखा है’ |मैं बहुत डर सी गयी थी |लेडी कांस्टेबल ने मुझे उनसे अलग करवाया ,और भी महिला कैदियों के चेहरे उनकी कहानियाँ कह देने को आतुर दिखे लेकिन ख़ामोशी से | उन सब में सब से ज़्यादा मुखर वही दोनों थी | बाहर आकर मैंने जेलर से उनके बारे में जब पूछा तब उन्होंने बताया कि ये लड़की ऑफिसर पोस्ट पर थी और एक अच्छे परिवार से ताल्लुक रखती है |लेकिन ये दोनों माँ-बेटी यहाँ जेल में दहेज़ एक्ट में निरुद्ध हैं क्यों कि मरते समय इसकी भाभी ने इनके ख़िलाफ़ बयान दिया था |झूठा या सच्चा कहने से वो बचे लेकिन मैं समझ गयी थी ये एक और झूठे दहेज़ केस का मामला है||दुःख होता है कि दहेज़ एक्ट एक सही उद्देश्य से बनाया गया था उसका भी ग़लत इस्तेमाल लोग कर रहे हैं |खैर मुझे पूरी तरह सच्चाई मालूम भी नहीं थी |उन्होंने ये भी बताया कि ये लड़की बहुत अच्छी कवितायेँ लिखती है और वो जल्द ही इसकी कवितायेँ प्रकाशित करवाने वाले हैं, सुनकर मुझे अच्छा लगा |

अगर सजा बेगुनाह को मिले तो उसके दुःख का अंदाज़ा हम लगा ही सकते हैं | मैं वापस घर आ गयी थी लेकिन मन वहीँ था |

फिर एक दो बार जाना हुआ और फिर से ऐसा ही घटनाक्रम |

जाते-जाते उसकी माँ ने भी अपना रजिस्टर मुझे थमा दिया ये कहते हुएअभी पिछले साल मेरा उनसे फिर मिलना हुआ |हर बार नए नए बंदी मिलते लेकिन ये दोनों हमेशा की तरह रिहाई के इंतज़ार करती हुई मिलतीं |इस बार मुझे इनके साथ ज़्यादा वक़्त मिला या यूँ कहिये इन्होनें मुझे जाने ही नहीं दिया |इनकी बातें सुनते सुनते अब मेरे भी आँसू इनके आँसुओं के साथ बहने लगे थे जिन्हें मैंने मुश्किल से रोका | थोड़ी ही देर में सब ठीक सा लगने लगा था जब कांस्टेबल ने कहा ‘मैडम आप जो गेम लाई हैं न,उसे ये दोनों सब बच्चों को सिखा देंगी,बहुत होशियार हैं दोनों’ ‘हाँ हाँ...क्यों नहीं ,हम इसे सेट करके सिखा देंगे बच्चों को’ दोनों ने कहा |(जेल में महिला बंदियों के साथ उनके अबोध और निर्दोष बच्चे अपनी क़िस्मत में बदी सज़ा काट रहे हैं )अख़बारों के ज़रिये ये मेरे बारे में काफ़ी कुछ अपडेट रहती थीं |हर बार मुझे उनकी ओर से बधाइयाँ मिलतीं और आशीर्वाद भी |इस बार तनु ने  मुझे ये कहते हुए अपनी क़िताब दी थी ‘सोनरूपा जी आप हमारा दर्द समझती हैं,मुझे अपनी क़िताब की कुछ ही कॉपियाँ मिल पायीं हैं | जिन्हें भी मैंने दी उन्होंने मुझे लौटाई ही नहीं ,न ही दो शब्द उस क़िताब के लिए कहे लेकिन मुझे उम्मीद है कि मेरे पास बची एकमात्र कविताओं की क़िताब को आप पढ़ेंगी और ज़रूर उसके बारे में कुछ लिखेंगी’ | मैंने उन्हें भरोसा दिलाया और वो क़िताब अपने साथ ले आई | जाते जाते उसकी माँ ने भी मुझे अपना रजिस्टर ये कहते हुए थमा दिया था किये कवितायेँ मेरे दर्द की दास्तान हैं ये रजिस्टर मेरे लिए बहुत क़ीमती है, इसे भी पढियेगा |मैं जानती थी कि अपने एहसासों को शब्दों में पिरो देने के बाद वो शब्द नहीं धड़कन बन जाते हैं | मैंने घर आते ही उस क़िताब और रजिस्टर की ज़ेरोक्स निकलवा कर उन दोनों संभाल कर रख लिया था |जैसे जैसे मैं कवितायेँ पढ़ती जा रही थी वैसे वैसे मैं ..................................!

आज फिर मिलने पर उसने बस इतना ही कहा ‘सोनरूपा जी आपने जो नोट उस संग्रह पर लिखा उसे उन्होंने बहुत संभाल कर रखा है ,मेरे लिए आज तक इतना अच्छा कभी किसी ने नहीं लिखा और ये कहते हुए वो फफ़क पड़ी’|मुझे मालूम था मैंने उस नोट में उसकी कविताओं में व्यक्त उसके दर्द को साझा किया था बस यही उसके लिए महत्वपूर्ण था | उसके साथ ही क्यों ये हम सबके साथ भी ज़िन्दगी में अक्सर होता है कि हमारे दुःख का साझीदार हमारे सुख के साझीदार से कहीं ज़्यादा अहम् हो जाता है |
वो  नोट और उस संग्रह की कुछ कवितायेँ मैं आप सब के साथ भी शेयर करना चाहूँगी 

सितम’ को पढ़ने के बाद _____________________________________

ऐसा पहली बार हो रहा है मेरे साथ कि लिखते-लिखते मेरी कलम की स्याही में अचानक ही स्याही नहीं पानी सा छलकने लगता है | ये पानी नहीं हैं ये आँसू हैं जो ‘सितम’ की कविताओं से गुज़रते हुए बार-बार मेरी आँखों में डबडबाने लगते हैं !

अगर दर्द की परिभाषा को जाननी हो तो सितम की कवितायें पढ़ना दर्द की नई परिभाषा को जानना होगा !

अगर साहस और अन्याय के खिलाफ़ शक्ति संचयन की लौ की तीव्रता नापनी हो तो इन कविताओं की आग महसूस कर कुछ पल के लिए आप भी अपने शरीर में चिंगारियों को चुभता महसूस करेंगे !

इतने कठिन जीवन के बावजूद भी मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों के प्रति विश्वास देखना हो तो ‘सितम’ की कविताओं के अर्थ टटोलने होंगे |

और आस के ख़ूबसूरत पलों की मधुरता को महसूसना हो तो फिर आपको ‘सितम’ की कवितायें को पढ़ते-पढ़ते एक सलोना सा ख़्वाब देखना होगा लेकिन फ़िर जाग कर उसे तोड़ना भी होगा |

सच ...क़िस्मत ने तनु को तूफ़ान में खड़ा कर दिया है |

बंद जगह जहाँ सिर्फ़ तूफ़ान है और तूफ़ान को झेलने वाला है |

ये तूफ़ान कमज़ोर क़ानून,स्वार्थ,भ्रष्टाचार,लालच,संवेदन हीनता,झूठ,फ़रेब की तेज़ हवाएं हैं |

अब ‘शाम’ होने के साथ उसे भी सोना ही है क्यों कि जागने का कोई सबब उसे नज़र नहीं आता,,उसके आस पास है ही क्या सिवाय चारदीवारी के |‘होलिका दहन’ के बाद रंगों से सरोवार होली में बिखरता लाल गुलाल उसे उसकी रोती हुई आँखों की लाली लगने लगा है|,उसका जन्मदिन अब निर्दोषों के उद्दार की प्रार्थना में बीत जाता है,| ‘हवा’ से न जाने कितने प्रश्न पूछती रहती है वो |क्यों कि हवा ही है जो उसके और उसके छूटे आँगन से उसका आभासी मेल कराती है,|पराधीनों और बेबस को जेल में  मुबारक़ स्वतंत्रता दिवस’ मनाना कठिन है , ये उसके सिवा और उसके जैसे निर्दोष बंदियों के अलावा कौन जानता होगा,|
जेल के लगाये गये मूक श्याम पट के दर्द का दर्द भी जो संभाले रहती है उसका दिल कितना दर्द से भरा होगा ?उसकी ज़िन्दगी में रानी के रूप में एक मात्र रौशनी है  जिससे मिलना,जिसके बारे में सोचना उसे कुछ देर के लिए फिर से अपनी माँ,भाई और भाई की छोटी सी बेटी यानि रानी के जीवन में हुए अन्याय के खिलाफ़ लड़ने का हौसला देता है |

यही है तनु यानि ‘सितम’ की कविताओं की लेखिका जिसने अपने अंदर का आन्दोलन कलम से लिखा है ,उन्हें कविताओं में ढाला है ,और शब्दों ने भी तनु  की संवेदनाओं का भरपूर साथ दिया है |कई कवितायेँ भावों की महीन कारीगरी लगती हैं |

ईश्वर से प्रार्थना है उन्हें रास्ते दिखायें जिनसे होकर वो अपनी मंज़िलों और ख़ुशियों को पा सकें|मैं यहाँ ईश्वर से सिर्फ़ उनके लिए रास्ता दिखाए जाने की प्रार्थना इसीलिए कर रही हूँ क्यों कि उन्हें पढ़कर और उनसे जेल में दो बार संक्षिप्त मुलाक़ात कर उनके ज़ज्बे और उनकी हिम्मत पर ख़ूब भरोसा है मुझे | दहेज़ क़ानून को अपनी ढाल बना कर फ़रेब के दुश्चक्र रचने वालों से अपनी जंग वो जल्द ही जीत जाएँ | 
कामनाएँ |

सोनरूपा 

                  जेल परिसर में लगाये गये अभिव्यक्ति पटल के स्वागत पर ... 

                                                                    संस्कारित सोच ...........
                                      जेल में बिना कारण कैद प्रत्येक मासूम बच्चे को समर्पित ....
 
वो क्यों हैं जेल में ?
        हवा को संबोधित करते हुए ...क्यों कि हवा ही है जो उसके घर आँगन से होकर उस तक पहुँचती है 
मुझे आज दोनों माँ बेटी के चेहरे पर शांति और स्वभाव में थोड़ी सी स्थिरता दिखाई दी जो आज से पहले मैंने नोटिस नहीं की थी | वो फिर हँसते हुए बोलीं ‘अब जेलर साहब ही बताएँगे कि हम कब जेल से बाहर आ रहे हैं’| मैंने दोनों को शुभकामनायें दीं |अब तक बैरक में टी .वी सेट हो चुका था | हमारा भी चलने का वक़्त हो गया था |बाहर आते-आते पता चल गया था कि ये दोनों अगले माह की पाँच तारीख़ को रिहा हो रही हैं,बहुत ख़ुश हुई मैं ये सुनकर,हालाँकि मेरे मन ने उन दोनों को उनकी कवितायें  पढ़ कर ही निर्दोष मान लिया था लेकिन अदालत का फ़ैसला अब आया था|हमारे देश में अक्सर गुनाहगार भी अदालत में सुनवाई होने से पहले ही अपने गुनाह की सज़ा काट लेते हैं,और बदकिस्मत बेगुनाह भी निर्दोष साबित होने तक |

इस बार मैं घर लौटते वक़्त परेशान नहीं थी जितना पहले जेल से लौटते वक़्त हुआ करती थी लेकिन मन ही मन ख़ुद से सवाल कर रही थी कि 'कि बेगुनाह क्या वाक़ई क़ैद से रिहा हो पाते हैं' ?

(तनु और लता नाम काल्पनिक हैं )






बुधवार, मार्च 04, 2015

सबकी होली शुभ-शुभ हो !

रंग है री'_______________सबकी होली शुभ-शुभ हो !
मौसम की उजली रंगत हो होली में
अंतहीन सुख की पंगत हो होली में
उत्सव का अस्तित्व बने सम्पूर्ण तभी
सबकी प्रेम भरी संगत हो होली में
____________________________ शुभकामनाएं !
वृन्दावन की गलियों जैसा आलम हो
हर पल सजनी के संग उसका प्रीतम हो
सब पर ही  हों रंग गुलाबी , लाल , हरे
हर मुखड़ा मुस्काता, मुक्त , मनोरम हो
____________________________शुभकामनायें!
पंछी के कलरव सा  मधुर  सवेरा हो
अम्बर ने धरती पर रूप बिखेरा हो
होली में हर चित्त का चित्र लगे जैसे
नेह की कूची से हर रंग उकेरा हो
___________________________शुभकामनायें  !
फूलों जैसे खिल-खिल जाएँ होली में
दिल से हर इक को अपनाएँ होली में
इन्द्रधनुष के रंग भरें पिचकारी में
ख़ुद रंगें सबको रंगवाएँ होली में
___________________________शुभकामनायें  !