बुधवार, अगस्त 31, 2011

ये कैसी कशमकश ?

एक तरफ़ उम्मीद तेरे आने की
एक तरफ़ खौफ़ तेरे जाने का
इसी कशमकश में उलझती जा रही हूँ मैं
जानती हूँ खौफ़ का पलड़ा भारी है उम्मीद से
फिर भी न जाने क्यों ...... सच को स्वीकारने में मुझे मेरा अंत नज़र आता है

शनिवार, अगस्त 27, 2011

गज़ल

उनसे शिकवे कभी गिले ही नहीं
हम भी ख़ुद से कभी मिले ही नहीं

हमको हालात ने तराशा है
ख़ुद की मिट्टी में हम ढले ही नहीं

बेसबब जी रहे हैं सपनों को
मेरी आँखों में जो पले ही नहीं

कैसे उस राह पर तुम्हे भेजें
हम भी जिस राह पर चले ही नहीं

हमने ख़ुद से वो ही सवाल किये
जिसके उत्तर हमें मिले ही नहीं

उम्र गुजरी है उनकी यादों में
जिनसे मिलने के सिलसिले ही नहीं

शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

मियाद

तुम इक दिन की मियाद
एक महीना
एक साल
या एक सदी भी कह देते
तो मान ही जाती मैं
जैसे ये माने बैठी हूँ
कि तुम आओगे
मुझे खोजते हुए ,
लेकिन
तब
जब मुझे खोज लोगे ख़ुद में |
मैं हूँ
मैं थी
मैं रहूँगी
यहीं
इंतज़ार में |
कभी गर्म शाल में लिपटी हुई ,
कभी पतझड़ में पत्तों सी झड़ती हुई,
कभी नई कोपलों सी महकती हुई,
कभी गर्म थपेड़ों से लड़ती हुई,
कभी बूँद बूँद आसमां सी बरसती हुई ........
सच
ये मौसम बड़े प्यारे हैं मुझे
शायद ये ही हैं जो
जो उस मियाद को छोटा कर देंगे
जिसकी मियाद मुझे ही नहीं मालूम ..............





मंगलवार, अगस्त 09, 2011

कालीन

गुनगुनाती हुई महफ़िलें गुनगुनाता हुआ
कालीन
हर रस रंग से सिक्त कविताओं की बैठकों का श्रोता
कालीन
मेरे गाँव से चल कर आई धूल से किसकिसाता
कालीन
शिकवों,ठहाकों,मज़ाकों,पुरानी मस्तियों की याद में रात भर जागी दोस्ती पर मुस्कुराता हुआ
कालीन
घर भर के मेहमानों को नींद की गोद देता 
कालीन 
बहुत से हल्दिया सगुनों से छिटकी हल्दी से पीला हुआ
कालीन
सब कहते हैं
पुराना हो गया है
सो लपेट कर रख दिया है एक कोने में
और
उसमें लिपट गयीं हैं
महफिलें,चर्चाएँ,बैठकें,गाँव की मिट्टी से सने पैर ,दोस्तों का जमघट ,मेहमानों की फ़ुर्सत,हल्दिया रस्में और भी बहुत कुछ
और उनमें शामिल मेरे अपनों के कदम



कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जो हमारे वजूद में पूरी तरह जज्ब सी हो जाती हैं और कुछ ऐसी भी जिन्हें कुछ प्रतीक दोहरा देते हैं और फिर एक रील सी चलने लगती है एक के बाद एक  उन स्मृतियों की , जिसमें वो प्रतीक तो  शामिल है ही साथ ही उससे जुड़ी बातें यादें.................


सोमवार, अगस्त 08, 2011

मनन

काग़ज  को कलम दे दूँ ?
चिंतन को मनन दे दूँ ?
जीवंत  ख़ुद को कर लूँ
शब्दों को कथन दे दूँ ?

इन प्रश्नों को सुलझाने के लिए  'लिखना  ज़रूरी है '