मंगलवार, अगस्त 09, 2011

कालीन

गुनगुनाती हुई महफ़िलें गुनगुनाता हुआ
कालीन
हर रस रंग से सिक्त कविताओं की बैठकों का श्रोता
कालीन
मेरे गाँव से चल कर आई धूल से किसकिसाता
कालीन
शिकवों,ठहाकों,मज़ाकों,पुरानी मस्तियों की याद में रात भर जागी दोस्ती पर मुस्कुराता हुआ
कालीन
घर भर के मेहमानों को नींद की गोद देता 
कालीन 
बहुत से हल्दिया सगुनों से छिटकी हल्दी से पीला हुआ
कालीन
सब कहते हैं
पुराना हो गया है
सो लपेट कर रख दिया है एक कोने में
और
उसमें लिपट गयीं हैं
महफिलें,चर्चाएँ,बैठकें,गाँव की मिट्टी से सने पैर ,दोस्तों का जमघट ,मेहमानों की फ़ुर्सत,हल्दिया रस्में और भी बहुत कुछ
और उनमें शामिल मेरे अपनों के कदम



कुछ स्मृतियाँ ऐसी होती हैं जो हमारे वजूद में पूरी तरह जज्ब सी हो जाती हैं और कुछ ऐसी भी जिन्हें कुछ प्रतीक दोहरा देते हैं और फिर एक रील सी चलने लगती है एक के बाद एक  उन स्मृतियों की , जिसमें वो प्रतीक तो  शामिल है ही साथ ही उससे जुड़ी बातें यादें.................


1 टिप्पणी:

  1. आदरणीया डॉ सोनरुपा जी ...मनन का नमन
    वाकई आपका साहित्य क्षेत्र का ज्ञान,
    काबिले तारीफ हें
    इस के आलावा आपको
    गायकी का भी शौक ...
    अद्भुत संगम हें
    आपके उज्जवल भविष्य की
    कामनाओ के साथ
    नवीन सी दुबे

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