शुक्रवार, अगस्त 19, 2011

मियाद

तुम इक दिन की मियाद
एक महीना
एक साल
या एक सदी भी कह देते
तो मान ही जाती मैं
जैसे ये माने बैठी हूँ
कि तुम आओगे
मुझे खोजते हुए ,
लेकिन
तब
जब मुझे खोज लोगे ख़ुद में |
मैं हूँ
मैं थी
मैं रहूँगी
यहीं
इंतज़ार में |
कभी गर्म शाल में लिपटी हुई ,
कभी पतझड़ में पत्तों सी झड़ती हुई,
कभी नई कोपलों सी महकती हुई,
कभी गर्म थपेड़ों से लड़ती हुई,
कभी बूँद बूँद आसमां सी बरसती हुई ........
सच
ये मौसम बड़े प्यारे हैं मुझे
शायद ये ही हैं जो
जो उस मियाद को छोटा कर देंगे
जिसकी मियाद मुझे ही नहीं मालूम ..............





2 टिप्‍पणियां:

  1. नमस्कार जी,
    ये कविता बहुत पसंद आयी है,

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  2. प्रिय आपने जो प्यार एवं चाहत को एक धागे में पिरोकर अच्छे तरीके से जो दर्शया है वाकई आप बधाई की पात्र है ईश्वर आपकी मनोकामना पूरी करे.

    आपका
    वी.पी.सिंह
    मोब.09971224023

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