शनिवार, अगस्त 27, 2011

गज़ल

उनसे शिकवे कभी गिले ही नहीं
हम भी ख़ुद से कभी मिले ही नहीं

हमको हालात ने तराशा है
ख़ुद की मिट्टी में हम ढले ही नहीं

बेसबब जी रहे हैं सपनों को
मेरी आँखों में जो पले ही नहीं

कैसे उस राह पर तुम्हे भेजें
हम भी जिस राह पर चले ही नहीं

हमने ख़ुद से वो ही सवाल किये
जिसके उत्तर हमें मिले ही नहीं

उम्र गुजरी है उनकी यादों में
जिनसे मिलने के सिलसिले ही नहीं

12 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीया डॉ.सोनरूपा जी
    सादर सस्नेहाभिवादन !

    पहली बार आपके ब्लॉग पर पहुंचा हूं … आपकी चारों प्रविष्टियों की रचनाएं देखीं … सुंदर चित्र और सुंदर भावों का सम्मिश्रण मन को भाया :)
    प्रस्तुत ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी -
    हमको हालात ने तराशा है
    ख़ुद की मिट्टी में हम ढले ही नहीं

    उम्र गुजरी है उनकी यादों में
    जिनसे मिलने के सिलसिले ही नहीं

    तमाम अश्'आर अच्छे हैं । इन दो शे'रों ने ज़्यादा छुआ मन को ।

    कैसे बतलादें तुम्हे ख्वाहिशों का हम रस्ता
    यह मिसरा बह्र से भटक रहा है ,
    … देखिए , यूं ठीक रहेगा , आपकी पूरी बात भी आ रही है -
    कैसे बतलादें ख्वाहिशों का पता :)
    आभार और मंगलकामनाएं !

    विलंब से ही सही…
    ♥ स्वतंत्रतादिवस सहित श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं !♥
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  2. टिप्पणी के लिए धन्यवाद स्वीकारें.........शुभकामनायें !

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  3. जिनसे न मिलने का सिलसिला होता,

    वक्‍त बेवक्‍त वो कहीं तो मिला होता है।

    बहुत सुंदर रचना।

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  4. बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल पढ़ने को मिली , पहली बार आपके ब्लॉग पर आया गलती मेरी .

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  5. कल 14/10/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  6. हम हालातों के तराशे हुए हैं और उन सपनों को जीते हैं जो अपनी आंखो मे नहीं पले ... बहुत सुंदर

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  7. खूबसूरत गजल ,अच्छे भाव ,बधाई ।

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  8. खूबसूरत अशार...
    बढ़िया गज़ल...
    सादर बधाई ...

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  9. मेरी गजल सराहने के लिए आप सभी को बहुत बहुत आभार ......

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