बुधवार, अगस्त 31, 2011

ये कैसी कशमकश ?

एक तरफ़ उम्मीद तेरे आने की
एक तरफ़ खौफ़ तेरे जाने का
इसी कशमकश में उलझती जा रही हूँ मैं
जानती हूँ खौफ़ का पलड़ा भारी है उम्मीद से
फिर भी न जाने क्यों ...... सच को स्वीकारने में मुझे मेरा अंत नज़र आता है

3 टिप्‍पणियां:

  1. मन की कश्मकश को बखूबी लिखा है ...

    मेरे ब्लॉग पर आने के लिए आभार

    कृपया टिप्पणी बॉक्स से वर्ड वेरिफिकेशन हटा लें ...टिप्पणीकर्ता को सरलता होगी ...

    वर्ड वेरिफिकेशन हटाने के लिए
    डैशबोर्ड > सेटिंग्स > कमेंट्स > वर्ड वेरिफिकेशन को नो करें ..सेव करें ..बस हो गया .

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  2. खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है जो कि खमाज
    थाट का सांध्यकालीन राग
    है, स्वरों में कोमल निशाद और बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं, पंचम
    इसमें वर्जित है, पर हमने
    इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी किया है, जिससे इसमें राग बागेश्री भी झलकता है.
    ..

    हमारी फिल्म का संगीत वेद
    नायेर ने दिया है... वेद जी
    को अपने संगीत कि प्रेरणा
    जंगल में चिड़ियों कि चहचाहट से
    मिलती है...
    Feel free to surf my homepage :: खरगोश

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