रविवार, सितंबर 25, 2011

ज़ेब के सूराख


गरीब की ज़ेब के सूराख से 
रेत की तरह  
त्यौहार बिना गाये  बजाये
बीवी की पांच ग़ज की साड़ी
बच्चों की भूख कि निवाले
माँ-बाप के दर्द के मरहम
बड़ी आसानी से निकल जाते हैं
भले ही किस्मत नहीं खुल पाती जिंदगी भर  उसकी
पर सूराख हमेशा खुले रहते हैं ....

10 टिप्‍पणियां:

  1. kya baat hai mam...ise kahte hain samaaj ke har tabke ke insaan ki niji jindagi se roobroo hona aur apni bhawnaaon ko shabdon ke maadhyam se paathko,mitron,aur shubhchintako tak pahunchana...thx aapki abika

    उत्तर देंहटाएं
  2. यही तो विडम्बना है हमारे समाज की अच्छी रचना ,बधाई

    उत्तर देंहटाएं




  3. आपको सपरिवार
    नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं-मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  4. jebo ke surakh bhar jaye esa hunar sikh do duniya ke gareebo ko

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपको लोहड़ी हार्दिक शुभ कामनाएँ।
    ----------------------------
    कल 13/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक अच्छे भाव की सफल प्रस्तुति - सुन्दर
    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    http://www.manoramsuman.blogspot.com
    http://meraayeena.blogspot.com/
    http://maithilbhooshan.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही सुन्दर और गहन विचार अभिव्यक्ति....

    उत्तर देंहटाएं