मंगलवार, अक्तूबर 25, 2011

सुख की बिछी बिसात हो दीपावली की रात

सुख की बिछी बिसात हो दीपावली की रात
हर पल खुशी की रात हो दीपावली की रात
दिन भर जो श्रम की धूप में तपते रहे यहाँ
उनकी हरेक रात हो दीपावली की रात
होली के साथ ईद भी रोशन करे चिराग
कुछ ऐसी करामात हो दीपावली की रात

शुक्रवार, अक्तूबर 21, 2011

बस द्वारे ही है रौशनी की बारात


मिट्टी के कुछ ढेले दीयों के आकार में ढल रहे हैं
रोशनियों की बारात हमारे द्वारे खड़ी है
बहुत उमंगें हैं लक्ष्मी जी की मुँह दिखाई करने की मन में
त्योहारी तैयारियाँ थका रही हैं
लेकिन थकान को तो जैसे ठंडी होती जा रही रात की नर्म हवा
सहलाकर
नींद की गोद देकर
दूर छिटक कर
कहती है
अभी कुछ दिन और बाक़ी है
उस अमावस की रात को
जिस रात दीवाली की फुलझडियाँ
छिटकेंगी आंगन में
अलसाई हुई अंगडाईयां
नहीं नहीं
अभी नहीं
अभी तो इंतज़ार है
रौशनी की बारात का .........

मंगलवार, अक्तूबर 18, 2011

गुंजाइश है क्या ?

रिश्तों के दफ़्तरों में
सुबह से शाम तक की हाजिरी की
थकान से पस्त इंसान को
घर (ख़ुद )में भी आकर भी सुकून कहाँ,
सुकून के लिए
किसी को समर्पण
और
किसी का समर्पण
ज़रूरी है
और हाजिरी में समर्पण की गुंजाइश है क्या ?

सोमवार, अक्तूबर 10, 2011

आज रात 'जगजीत' बेफ़िक्र नींद सोये हुए हैं .....

आज रात 'जगजीत' बेफ़िक्र नींद सोये हुए हैं ......
टी.वी. के सारे न्यूज चैनल बदलते बदलते ,जगजीत जी पर ख़ास पेशकश छानते - छानते रात के दो  बज चुके हैं  और अब क्यों कोई  चैनल जगजीत जी पर कुछ ख़ास पेश करेगा  बस इसी वजह से रिमोट पर मेरी उँगलियाँ उन्ही की तस्वीरें ,उन्ही की ग़ज़लें ढूँढ रही हैं, बेचैन सी  हूँ  उन पर जितना कवरेज देख सकूं देख लूं  .....

नींद ने मुझे आज इजाजत दे दी है कि जाओ जागो अपने जगजीत के साथ .... लेकिन जगजीत जी  के आज बिना धड़कन के सो रहे है बस इसी बात का तसव्वुर ना जाने कितनी देर मुझे और जगाएगा | मेरी प्रेरणा सो चुकी है इससे ज्यादा क्या  कहूँ ? क्यों शिकायत करूँ मैं अपनी आँखों से कि क्यों नहीं झपकती पलकें इतनी रात गए ...........


मेरी हर कम्पोज की हुई गजलों में जगजीत जी का अंदाज  शामिल ना हुआ हो ऐसा बहुत कम हुआ और अगर हुआ भी तो वो धुन से  मेरा रिश्ता क़रीबी  नहीं रहा,कई बार सोचा इस बार कुछ संजीदगियाँ और साद्गियाँ कम और सुरों की हरकतें ज्यादा ......लेकिन पहला प्यार तो आख़िर पहला ही होता है और पहला प्यार था जगजीत का अंदाज......और मैं  लौट  फेरकर वहीं  फिर यानि अपने प्यार के पास सिर्फ़ और सिर्फ़  अपने सुकूं के लिए .........


अलौकिक जगत का नहीं मानती हूँ मैं ख़ुद को ...........  कहते है रूह को मौत से नहीं तोलते, रूह कभी नहीं मरती और मौत तो है ही मरने का पर्याय...... मैं भी हमेशा यही लिखती आई हूँ ,सोचती आई हूँ और मानती भी आई हूँ लेकिन  फिर भी आज फिर अपनी इस बात से पलट रही हूँ क्यों ?  फिर से वही सच क़ुबूल रही हूँ कि मैं ख़ुद को अलौकिक जगत का नहीं मानती यानि बेबस हूँ एक मौत के सामने एक बार फिर..........


जगजीत जी को  ब्रेन हैमरैज होना ,फिर सर्जरी होना उसके बाद  उनका वेंटीलेटर  जाना... ये पूरा का पूरा घटनाक्रम ठीक वैसा ही था जैसा मेरे पिता ने भोगा..   मेरे पिता के बारह दिनों तक चले जीवन संघर्ष ने मुझे कई रात आँसुओं से  भिगोया है और भिगोयेगा भी  ..............जगजीत जी आपको भी इतनी ही जल्दी थी  ? .........
आपने बहुतों के ग़म गाये ख़ुद के ग़म के साथ ......आपकी आवाज का साथ दरख़्त था एहसासों का 
जिसकी हवाओं के साथ मैंने
 भी अपना दर्द ,अपनी खुशी,कुछ ज़िन्दगी के सच गुनगुनाये ना जाने कितनी बार .......

शनिवार, अक्तूबर 01, 2011

चलो कुछ यूँ कर लें

देखो न
इस बार मैंने कितनी ख़ुशबुएँ बोई हैं लॉन में
तुम भी कभी कभी 
रजनीगंधा के फूल बाज़ार से ले आया करो,
मुझे फिर से
फूलों के प्रिंट की साड़ियाँ सुहाने लगी हैं
तुम भी कभी कभी
 वो कुछ 'ख़ास' ग़ज़लें गुनगुनाया करो,
मैंने अबकी बार 
 घर की दीवारों को समंदर के रंग सा रंगवाया है
तुम भी मेरे साथ
तितलियों के रंग से परदे ,हवाओं सी चादरें,चिड़ियों सी चहचहाती पेंटिग्स सजवाया करो,
तुम भी जानते हो मैं भी
हम अब 'ऑप्टिमिस्टिक'  होना चाहते हैं,
उलझनों की गिरफ़्त
अहसासों की छुअन तक का गला घोंट देती है,
क्यों ना चलो कुछ यूँ कर लें
फिर से पिरोयें
अहसास
कोशिशों के धागे से