मंगलवार, अक्तूबर 18, 2011

गुंजाइश है क्या ?

रिश्तों के दफ़्तरों में
सुबह से शाम तक की हाजिरी की
थकान से पस्त इंसान को
घर (ख़ुद )में भी आकर भी सुकून कहाँ,
सुकून के लिए
किसी को समर्पण
और
किसी का समर्पण
ज़रूरी है
और हाजिरी में समर्पण की गुंजाइश है क्या ?

7 टिप्‍पणियां:

  1. मात्र हाज़िरी लगाने की बात हो , फिर समर्पण कहाँ...!

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  2. कोमल एहसास के साथ बहुत ख़ूबसूरत रचना! शानदार प्रस्तुती!

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  3. sukoon ke liye kisi ko samarpan
    aur kisi ka samarpan jaroori hai
    mahaj ek doosre ke liye hi nahi balki sabhi ke liye samarpan ya samghouta aavysyak hai jindgi ko aage barhane ke liye

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