रविवार, नवंबर 20, 2011

दृष्टि नहीं है भेद पाने की

सुविधायें भी दुविधायें हैं
कभी कभी
जब लगता है
मेरे पास दृष्टि नहीं है
भेद पाने की
भौतिक चश्मे को उतार कर देख पाने की  
सुख की उन असीमित पराकाष्ठाओं को
जिस सुख का पाठ सदियों से महापुरुषों के मुख से होता आया है

कभी कभी
इनका आवरण उतार कर
मिलना चाहती हूँ
उस प्रश्न  के उत्तर से

जहाँ मैं प्रतिरोध कर पाऊं
अपने शारीरिक कष्टों का
और प्रेरक बने वो मेहनतकश औरत
जिसके लिए सूखी रोटी भी उसके हीमोग्लोबिन का स्तर ऊँचा रखती है 

मशीनी सुकून की आदतों को दरकिनार कर
छत पर ओस की धागे सी बारीक झिमझिमाहट के नीचे सोऊँ
जब तक जागूँ करती रहूँ झंकृत अपनी बातों से
चाँद सितार को 
  
चेहरे की रंगत के दब जाने से बेपरवाह
धूप से भी कर लूँ दोस्ती
जिससे अब तक मेरे घर के अचार,बड़ियों,कपड़ों का ही बेतकल्लुफ़ सा रिश्ता है

बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत सारी
छोटी-बड़ी इच्छाओं सी पतंगों की दिशाओं का और उड़ानों का
प्रारंभ भी मैं और अंत भी मैं ............

बुधवार, नवंबर 02, 2011

टिप

पश्चिमी उत्तरप्रदेश का एक छोटा सा ज़िला है बदायूँ |इल्तुतमिश,अमीर खुसरो ,हज़रत निजामुद्दीन, इस्मत चुगताई ,फानी बदायूँनी ,शकील बदायूँनी ,दिजेंद्र नाथ'निर्गुण ',मुंशी कल्याण राय ,पद्म विभूषण उस्ताद गुलाम मुस्तफ़ा खां ,पद्म श्री उस्ताद राशिद खां ,ओज कवि डॉ.ब्रजेन्द्र अवस्थी ,राष्ट्रीय गीतकार डॉ.उर्मिलेश जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों एवं संगीतकारों की जन्मभूमि बदायूँ में मैं भी जन्मी हूँ ,यहाँ  की मिट्टी में ही संगीतिकता,साहित्यकता,सांस्कृति
कता की सुगंध मिली हुई है |

अँग्रेजशासित समय में निर्मित 'बदायूँ क्लब 'जो कि पहले यहाँ के कलेक्टर 'एलन' के नाम पर 'एलन क्लब' के नाम से जाना जाता था ,बदायूं के इतिहास में बड़ा एतिहासिक महत्व रखता है उसकी महिला विंग की विगत दो वर्षों से मैं सक्रेटरी रही हूँ |बहुत से सांस्कृतिक आयोजन हम समय  -समय पर करते रहे हैं  समय -समय पर क्लब सदस्यों की श्रीमतियाँ एकत्रित  होती हैं 'गेट टुगेदर' के लिए |वहाँ बड़ी खुशमिज़ाजी से एक बारह साल का बच्चा जो कि क्लब के एक employee का बेटा है.....चाय,पानी इत्यादि की service कर देता है इस उम्र में भी एक अक्षर लिखना उसके लिए भारी है |स्कूल का मुँह उसने देखा ही नहीं  .......

 उसका शुष्क बचपन मेरी 'टिप' से कुछ पल के लिए हरा हो जायेगा ,इसी लोभ में वो मेरे पास मंडराता रहता है (ऐसा मुझे महसूस होता है ) ज़रा सोचने की आदत ज़्यादा  है इसीलिए घर जाकर भी उसका चेहरा आँखों के सामने बार बार आता रहता है जब अपने बच्चों को उसी टिप वाले नोट को एक बस एक chocolate के स्वाद में ही उड़ता हुआ देखती हूँ | किसी के लिए 'कुछ' इतना ज्यादा और किसी के लिए 'कुछ 'इतना कम...... ख़ैर  'इसे कहते हैं'क़िस्मत' ...इस सेंटेंस को डिफाइन करने में काम आते होंगे ये  कुछ और ज़्यादा जैसे लफ्ज़ ...........
कुछ सोचा तो कुछ लिखा भी.............कुछ लिखा कुछ मिटाया हुआ आज आप के साथ.........

          

मेरी ये रचना समाज के कुछ ऐसे लोगों ( जिनमें मैं भी शामिल हूँ )केंद्रित  है जो जागरूक होने का दंभ तो भरते हैं लेकिन उनकी जागरूकता सिर्फ स्वयं के सुकून लिए है ,लेकिन ये भी माना जाये कि अगर हमारे  मन में संवेदनाएं हैं तो संवेदनाएं होना भी आज के यांत्रिक युग में एक उपलब्धि ही कही जायेगी लेकिन अपनी अपनी व्यस्तताओं में घिरे हम सब  ऐसे बच्चों की  शिक्षा के प्रति उदासीनता दूर करने की कोशिशों को गंभीरता से नहीं लेते और लेते भी हैं तो समय के अभाव का रोना रोकर कतराए हुए से रहते हैं  या इनके विकृत हो चुके बचपन जिसका कारण मैं  इनकी नासमझ परवरिश को ही मानती हूँ , को सुधारना इतना जटिल होता है कि कोशिशें इनके सामने नाकाम सी होती देख उन्हें उसी हाल में छोड़ कर अपनी जिंदगी में हम फिर लौट आते हैं  जहाँ वो अपने जीवन की विडंवनाओं से अनजान हैं लेकिन मस्त हैं .....इनके लिए हमारा पहला कदम ये भी होना चाहिए कि ये किताबें उठायें उसमें दर्ज अक्षरों को पढ़ने के लिए नहीं बल्कि समझने के लिए भी!   

टिप

वो बचपन
जी हाँ
सिर्फ़ कम उम्र ही वजह है
कि बचपन  कहा जाये 
वरना कहाँ है बचपन ?

मैले कुचले कपड़ों में सिमटी दुर्गंधित देह में 
साँस लेता बचपन
सफाई जिसके लिए अभिशाप जैसी है
बड़ी चुस्ती फुर्ती से ,सफाई से प्लेट्स चमका रहा है
किसी लोभ में 

वही बचपन
जिसकी सूखी जीभ
प्लेटों में सजे स्वाद
बार बार गीली कर रहे हैं

उसी बदरंग से बचपन पर 
न जाने कितनी बार 
सार्वजानिक तौर पर संवेदनाएं जताती रही हूँ ,
व्यक्तिगत रूप से अपनी संवेदनाओं को
कुछ जरूरत भर की चीज़ें ,कपड़े,किताबें देकर 
संतुष्ट हो जाती हूँ 

आज जब किसी से सुना 
कि मेरे दिए कपड़े 
इतवार के बाज़ार में बिकने वाले उतरन कपड़ों के साथ बिकते हैं 
और किताबें चूल्हे की आग तो तेज़ करती हैं  
बाक़ी चीजों को बेचने के बाज़ार का रास्ता भी वो जानता है
क्यों कि ज़रूरी है बेचना
जुआ खेलने के लिए

तब से
अपनी नाम मात्र की संवेदनाएं को 
मैंने पर्स में संभाल कर रख लिया हैं

लेकिन पता नहीं क्यों मैं 
कुछ आश्वस्त सी हूँ
भले ही ये 'छोटू ' जाहिल बना रहे, अनपढ़ रहे 
लेकिन ऊपर वाले की बक्शी हुई साँसों को खींच ही लेगा
इन चालाकियों से आज के समय के लिए 
क़ाबिल सा लगने लगा है मुझे
अब ये बचपन ,
           
लेकिन
मैं 
मैं क्या  
सिर्फ
लिखूँ 
जताऊँ.........  



 और  इतिश्री  ?











पश्चिमी उत्तरप्रदेश का एक छोटा सा जिला है बदायूँ | शकील बदायूँनी ,फ़ानी बदायूँनी,दिजेंद्र नाथ 'निर्गुण ',मुंशी कल्याण राय पद्म विभूषण उस्ताद गुलाम मुस्तफा खान