रविवार, नवंबर 20, 2011

दृष्टि नहीं है भेद पाने की

सुविधायें भी दुविधायें हैं
कभी कभी
जब लगता है
मेरे पास दृष्टि नहीं है
भेद पाने की
भौतिक चश्मे को उतार कर देख पाने की  
सुख की उन असीमित पराकाष्ठाओं को
जिस सुख का पाठ सदियों से महापुरुषों के मुख से होता आया है

कभी कभी
इनका आवरण उतार कर
मिलना चाहती हूँ
उस प्रश्न  के उत्तर से

जहाँ मैं प्रतिरोध कर पाऊं
अपने शारीरिक कष्टों का
और प्रेरक बने वो मेहनतकश औरत
जिसके लिए सूखी रोटी भी उसके हीमोग्लोबिन का स्तर ऊँचा रखती है 

मशीनी सुकून की आदतों को दरकिनार कर
छत पर ओस की धागे सी बारीक झिमझिमाहट के नीचे सोऊँ
जब तक जागूँ करती रहूँ झंकृत अपनी बातों से
चाँद सितार को 
  
चेहरे की रंगत के दब जाने से बेपरवाह
धूप से भी कर लूँ दोस्ती
जिससे अब तक मेरे घर के अचार,बड़ियों,कपड़ों का ही बेतकल्लुफ़ सा रिश्ता है

बहुत बहुत बहुत बहुत बहुत सारी
छोटी-बड़ी इच्छाओं सी पतंगों की दिशाओं का और उड़ानों का
प्रारंभ भी मैं और अंत भी मैं ............

27 टिप्‍पणियां:

  1. bahut khoob ekdum natural khaaskar apne chehre ki rangat dab jaane se beparwah..

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  2. सुन्दर शब्द और अद्भुत भाव लिए अप्रतिम रचना ...बधाई


    नीरज

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  3. जैसे जैसे ज़िंदगी में रहन सहन के स्तर की ऊपरी पॉयदानों में हम चढ़ते चले जाते हैं ज़मीनी परिवेश से कटना स्वाभाविक हो जाता है। कभी कभी लगता है ऊपर से तो इतने परिष्कृत हो गए हैं पर अंदर का बढ़ रहा खोखलापन कचोटता है क्यूँकि हम जानते हैं कि हमने इन सीढ़ियों को चढ़ते क्या खोया है।

    कविता में व्यक्त भावनाएँ मन में कुछ ऐसे ही अहसास जगा गयीं..

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  4. स्त्री मन की इतनी सुन्दर व्याख्या बहुत दिनों बाद दिखी है... आभार

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  5. काश ऐसा होता तो कितना अच्छा था लेकिन भौतिक सुखों की चाह ख़त्म ही नहीं होती ,सुंदर शब्दों के संयोजन से रची रचना अच्छी लगी आभार

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  6. सुन्दर प्रस्तुति, सार्थक, बधाई.

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  7. शानदार रचना और खूबसूरत प्रस्तुती ......सोनरूपा जी

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  8. डॉ. उर्मिलेश जी को पढ़ा है... उनका एक शेर अब भी याद है मुझे...
    "एक पहेली है ज़िंदगी अपनी
    क्या पता हल हुई, हुई, न हुई"....
    उनकी पुत्री के रूप में आप भी बेहतरीन लिख रही हैं... आपकी यह कविता बहुत सुन्दर है..

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  9. Whoa, thanks for writing about it. The subject seems intriguing. Will make a note of your web-site and pop back again. Seems like an awesome source. Take care.

    From everything is canvas

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  10. प्रेरक बने वो जिसके लिए सूखी रोती भी हिमोग्लोबिन बढ़ाती है ..
    धूप से अचार बड़ियों का रिश्ता ... गज़ब की रचना है ..बहुत सुन्दर ..

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  11. @मनीष जी आप बिलकुल सही कह रहे हैं,@सुशील जी इन्हीं भौतिक हेरफेर में उलझे हुऐ हम सब जिंदगी का चक्र पूरा करलेंगे !

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  12. अरुण जी आपसे ब्लॉग के जरिये मिल कर अच्छा लगा ,और आप मेरे पिता जी को भी पढ़ चुके हैं ये जानकार भी !

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  13. वंदना जी,अनुपमा जी ,संजय जी ,वंदना जी,अरविन्द जी ,संजय कुमार जी ,शुक्ल जी ,नीरज जी ,UNLUCKY ....आप सब तक मेरी बात संप्रेषित हुई ,आपका साथ मिला....अच्छा लगा !

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  14. बहुत ही अच्छा लगा आपको पढकर,सोनरूपा जी.
    सुन्दर भावों का खूबसूरती से संयोजन किया है आपने.
    प्रस्तुति के लिए आभार.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.

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  15. बहुत गहरी बातें अभिव्यक्त हो रही हैं इस सुंदर कविता में।

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  16. प्रारम्भ भी मैं ..अंत भी मैं

    जीवन दर्शन को
    क़रीब से समझने की
    कामयाब कोशिश ...
    अद्भुत , अनूठा काव्य !

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  17. बहुत उम्दा रचना! ये पंक्तियाँ बहुत प्रभावित करती हैं.

    "और प्रेरक बने वो मेहनतकश औरत............."

    "मशीनी आदतों को दरनिकार का........."

    और इस पंक्ति में धूप और हमारे बीच के रिश्ते को क्या खूब बयाँ किया है आपने!

    "धूप से भी कर लूं दोस्ती............"

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  18. चेहरे की रंगत.....

    बहुत ही शानदार रचना के लिए बधाई

    सोनरूपा जी आपका मेरे ब्लॉग पर हार्दिक स्वागत है


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    pliz join my blog

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  19. सोनरूपा विशाल जी ..अभिवादन
    और प्रेरक बने वो मेहनतकश औरत ....जिसके लिए सुखी रोटी भी उसके हेमोग्लोविन का स्तर ऊँचा रखती है ...
    बहुत सुन्दर विषय और मूल भाव ..परिस्थितिजन्य दृश्य ...बधाई हो ...
    भ्रमर ५

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  20. मैंने इस पर टिप्पणी कि थी पर यहाँ दिखाई नहीं दे रही है ..आज कल टिप्पणियाँ स्पैम में चली जाती हैं ... तो कमेन्ट का स्पैम देख लिया कीजिये ...

    सुन्दर रचना

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  21. चेहरे सुंदरता कायम रखते हुए धुप का आन्नद अवश्य उठाओ. बेहद उम्दा रचना.

    शुभकामनायें.

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