मंगलवार, दिसंबर 20, 2011

गज़ल

ग़ज़ल 

खुद को कैसे सोचें अब
हर लम्हे तुमसे  हों जब

हाथ मिलाएं उनसे क्यूँ
दिल में शक शुबहे हों जब

उस दिन की उम्मीद में हैं
सपनीली सुबहे हों जब

ख़ुद में यकीं ज़रूरी  है
पथरीली राहें हों जब

कैसे प्यार के गीत लिखें
जीवन में आहें हों जब

गुरुवार, दिसंबर 08, 2011

आधी दुनिया की कुछ ज़िन्दगियाँ " जिन्हें सब कुछ स्वीकार है "

आधी दुनिया की कुछ ज़िन्दगियाँ " जिन्हें सब कुछ स्वीकार है "


25 नवम्बर को 'International day for the ellemination of violence against women 'से शरू होकर १० दिसंबर 'अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार दिवस ' की समाप्ति तक एक बार फिर हम '16 days of activism against gender violence' मना रहे हैं |सपष्ट है आधी दुनिया की कुछ  ज़िन्दगियाँ आज  भी ऐसे किसी भी दिवस के अर्थों से अंजान हैं |उनके लिए १६ दिन क्या १६ सदियाँ भी उनकी अस्तित्व को शून्य से शिखर नहीं दे पायीं |ऐसी ही कुछ ज़िन्दगियों  के नाम ......



कुछ काँच के टुकड़े 
हथेली में भीचें हुए हूँ मैं ,
बचपन से लेकर झुरियों तक  के सफ़र तक 
शायद,
अब  
मेरी लकीरें 
कट कट कर
जुड़ जाने की मजबूरियों को भी 
हौसलों का नाम देकर 
खुशफ़हम सी रहती  हैं |