सोमवार, जनवरी 02, 2012

ग़ज़ल

मेरी लिखी हुई गिनी चुनी ग़ज़लों में से एक ग़ज़ल


हाल में ही आम आदमी के सरोकारों को अपनी कलम से आवाज देने वाले शायर 'अदम गोंडवी ' के निधन के पश्चात फिर से वही सरकारी मदद और पुरस्कारों की घोषणाओं का नाटकीय शोर सुनाई  देने लगा ..........


ठीक ऐसे ही कालजयी उपन्यास ' राग दरवारी' के रचनाकार श्री लाल शुक्ल को एक प्रतिष्ठित पुरस्कार तब दिया गया जब उनके लिए पुरस्कार के कोई मायने ही नहीं थे .............


ऐसे ही ना जाने कितने सम्मानित विभूतियों  को ऐसी स्तिथि में सम्मान की औपचरिकता के निर्वहन का एक हिस्सा तब बनाया जाता है जब उनकी उम्र अपना पड़ाव तय कर चुकी होती है ........... 


आखिर जीवन के अंतिम पलों  में या मृत्यु उपरांत दिए जाने वाले पुरस्कारों का क्या औचित्य है ?ये  प्रश्न हम आम जन के दिमाग में ना जाने कितनी बार कौंधता है जब न्यूज पेपर ,समाचार हमें बताते हैं कि अमुक सम्मान अमुक को .......


माना कि कलाकार या साहित्यकार के सृजन को पुरस्कारों की दरकार नहीं होती फिर भी कला का सम्मान करना यानि अपनी संस्कृति का सम्मान करना है फिर वो सम्मान उस समय क्यों नहीं जब कलाकार उस सम्मान के  ओज और उत्साह से  अपने कृतित्व को और रवानी दे सके  ..............


यही सब सोचते सोचते ये  दो लाइन अपने मोबाइल के नोट बुक पर लिखीं थीं .......अब कद्र -रहमतें  क्यों भला / जो चला गया वो चला गया ...............कल जब नींद ने मोहलत दे दी थोड़ी देर जागने की तो सोचा इस शेर के साथ पूरी ग़ज़ल को ही मुकम्मल करूँ कुछ और पहलुओं के साथ  ............


जो लिखा नहीं वो पढ़ा गया 
जो कहा नहीं वो सुना गया 

उसे सब अमीर -ऐ -दिल कहें 
वो जो शख्स आँसू छुपा गया 

अब कद्र ,रहमतें क्यूँ भला 
जो चला गया ,वो चला गया 

हम दायरों में ही खुश रहे 
हमें खुशमिज़ाज कहा गया 


सुबह ख़्वाब लगते हैं अजनबी 
हमें नींद में भी छला गया 

जिसे दुःख कभी ना रुला सके 
उसे पल खुशी का रुला गया 

हर रास्ते का मुकाम है 
हर मात पे ये कहा गया