शनिवार, जून 09, 2012

दोष किसका मेरा या तुम्हारा ?

दोष किसका मेरा या तुम्हारा ?


हुत थके से ,उनीदे से लग रहे हो तुम कुछ शिकायती से भी ,

माँओं की लोरियां भी आपने लाडलों को नींद का बिस्तर दे चुकी हैं

चौपालों के हुक्कों की गुडगुडाहट भी चुप है
चूल्हों की राख भी ठंडी हो चुकी है अब 

गाँव से चलें शहरों की ओर 

तो 

रौशनी से जगमगाते टॉवर रात गए इठला
रहे हैं अपने उजालों पर  

 सड़कों पर भी गिनी चुनी सी रफ्तारों का शोर है
बस जारी है तो रोशनियों की चहलक़दमी
 श sssssssssssssssssssssssss

'एक नींद की जागीर 

सब लूटने चले हैं सोकर '

और तुम हो कि मेरे ख़्वाबों में चहलकदमी कर रहे हो

 फिर 

क्यों न होगी थकन ,उनींदे दिन ,उबासी साँसे

अब बताओ 

दोष किसका मेरा या तुम्हारा ? 




9 टिप्‍पणियां:

  1. एक नींद की जागीर
    सब लूटने चले हैं सोकर

    और तुम हो कि ...

    बहुत खूब, एहसास का बहुत खूबसूरत बयान

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  2. सच ही कहा है...

    एक नींद की जागीर
    सब लूटने चले हैं सोकर.

    बधाई.

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  3. (¯`'•.¸*♥♥♥♥*¸.•'´¯)
    ♥बहुत सुन्दर प्रस्तुति♥(
    ¯`'•.¸*♥♥*¸.•'´¯)♥
    ♥♥(¯`'•.¸**¸.•'´¯)♥♥
    -=-सुप्रभात-=-
    (¸.•'´*♥♥♥♥*`'•.¸)

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  4. यह कविता पाठक के मन पर एक चित्र-सा अंकित करती हुई आगे बढ़ती है।

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