गुरुवार, अगस्त 30, 2012

ग़ज़ल

ग़ज़ल 

काग़ज पे घर बहुत से बनाये गए हैं आज 
 बेघर को सब्ज़  बाग़ दिखाए  गए हैं आज 

अख़बार की कतरन में चमकने के वास्ते 
बेबात के भी जश्न मनाये गये हैं आज 

मायूसियाँ कहीं इन्हें वीरान न कर जाएँ 
कुछ हसरतों के मेले लगाये गये हैं आज 

हर रात पूछता है बिस्तर मेरा मुझसे 
आँखों में कितने ख़्वाब सजाये गये हैं आज 


15 टिप्‍पणियां:

  1. ......वाह क्या बात है सोंरूपा जी..बहुत खूब काबिले तारीफ

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  2. Bahut umada gazal hai sonrupa ji


    en khwabon kahan sahejun es fikra me hoon

    pyar ka ek paigam likh dun es fikra me hoon

    tera eshak meri mohabbat aisi ebadat hai manu

    sadiyon tak kaise sahejun abhi es fikra me hoon

    Manoj gautam 'manu'

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  3. यथार्थ को दर्शाती, सुन्दर ग़ज़ल .

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  4. वाह! शानदार गजल.
    बहुत ही खूबसूरती से आज के यथार्थ
    का दर्शन कराया है आपने.

    भावमयी प्रस्तुति के लिए आभार,सोंनरूपा जी.

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  5. बड़ा ही सामयिक शेर लगा ये :)

    अख़बार की कतरन में चमकने के वास्ते
    बे- बात के जलसे भी मनाये गए हैं आज

    हर रात पूछता है बिस्तर मेरा मुझसे
    दिन भर में कितने ख़्वाब सजाये गए हैं आज

    बहुत खूब ..आपका लिखना सचमुच जरूरी है !

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    From India

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  7. gahan aur bahut sundar abhivyakti ...hriday tak pahunchati hui ..!!
    shubhkamnayen ..!!

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