मंगलवार, जुलाई 30, 2013

सादगी की उसूल की बातें

मेरे पिता डॉ .उर्मिलेश की ग़ज़ल  का मतला है ....

सादगी  की,  उसूल  की   बातें
आजकल हैं फ़िज़ूल की   बातें


और शायद इसी बात को अनदेखा कर दिया कुछेक उसूलों पर चलने वाले,जिन्हें हम ऊँगलियों पर गिन सकते हैं उनमे से एक आई ए एस 'दुर्गा शक्ति नागपाल' ने,अब वक़्त ही ऐसा हैं कि उसूलों का कोई वजूद ही नहीं।किस्से कहानियाँ में ही सुनिए अब ऐसे चारित्रिक गुण।बावजूद इसके,क्यों कि हैं तो इंसान ही, इसीलिए नकारात्मकता के साथ-साथ आज के समय में भी थोड़ा बहुत सकारात्मक सोचने की भी हिम्मत कर लेते हैं…क्यों कि वक़्त की ज़रुरत भी है हमारी हिम्मत ,एक बात और सोते रहने वाले एक तरह मृत कहलाये जाते हैं और जीते जी खुद को मृत कहलवाना किसे पसंद होगा ? इसीलिए मैंने जिनके शेर से बात शुरू की है तो उन्हीं के चंद  अशआर से दुर्गा के साथ खड़े हुए हाथों में अपना हाथ भी शामिल करती हूँ ……।

वजूद अपना ज़रा इस्तेमाल करता चल
जवाब खुद ही मिलेंगे सवाल करता चल

फिर उसके बाद ज़माने के सह सके पत्थर
तू काम ऐसा  कोई बेमिसाल करता चल

जो अपनी  बीन पे तुझको नचा रहे हैं यहाँ
तू उन सपेरों का जीना मुहाल करता चल

ये सारी मंज़िलें तुझको ही कर रही हैं तलाश
तू इनकी सिम्त ज़रा तेज़ चल करता चल -डॉ.उर्मिलेश

दुर्गा नागपाल...........................................चीयर्स!

रविवार, मार्च 10, 2013

ग़ज़ल

 ख़ुद को  मत इंसान समझिए 
अच्छा है ,हैवान समझिए 

चीखें,टीसें,ज़ख़्मी आँखें 
शहरों को शमशान समझिए 

मौली चूड़ी ,फ़ीकी मेंहदी 
टूटे हैं अरमान समझिए 

ग़म का चूल्हा ,रोटी उनकी
ख़ूनी दस्तरखान समझिए

मातमपुर्सी वक़्ती है अब

सब हैं बेईमान समझिए 

ख़ातिरदारी  थोड़ी   करिये  
शातिर हैं मेहमान समझिए

रोज़ ब रोज़ मिलेंगे काँटें
फूलों की पहचान समझिए

रौनक अफज़ा दिखते हैं ,पर
भीतर हैं सुनसान समझिए
............................................हालातों का जायज़ा , लफ़्ज़ों की हिदायतें !

.................................................सोनरूपा !!

गुरुवार, जनवरी 31, 2013

ग़ज़ल



रूहानियत में डूब के जब से ग़ज़ल हुई 
सच मानियेगा  बाहर में  तब से ग़ज़ल हुई 

महफ़िल में रौशनी को नई ज़िन्दगी मिली  

इतनी हसीन आपके लब  से ग़ज़ल हुई

यूँ तो क़लम संभाले ज़माना गुज़र गया 

ये कुछ पता नहीं हमें कब से ग़ज़ल हुई

लम्हात ख़ास जब भी इसमें  बयां किए
इक हमसफ़र के जैसी तब से ग़ज़ल हुई

ढाला है जब से इसमें मैंने तुम्हारा अक्स
मेरी नज़र में आला वो सब  से ग़ज़ल हुई


मकतब- पाठशाला