गुरुवार, जनवरी 31, 2013

ग़ज़ल



रूहानियत में डूब के जब से ग़ज़ल हुई 
सच मानियेगा  बाहर में  तब से ग़ज़ल हुई 

महफ़िल में रौशनी को नई ज़िन्दगी मिली  

इतनी हसीन आपके लब  से ग़ज़ल हुई

यूँ तो क़लम संभाले ज़माना गुज़र गया 

ये कुछ पता नहीं हमें कब से ग़ज़ल हुई

लम्हात ख़ास जब भी इसमें  बयां किए
इक हमसफ़र के जैसी तब से ग़ज़ल हुई

ढाला है जब से इसमें मैंने तुम्हारा अक्स
मेरी नज़र में आला वो सब  से ग़ज़ल हुई


मकतब- पाठशाला

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ...क्या बात है ...बहुत सुन्दर और कामयाब ग़ज़ल ...हर शेर काबिले दाद हुआ है ...दाद कबूल करें।

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  2. क्या खूब गजल कही आपने सोन रूपा जी बहुत खूबसूरत


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  3. ना जाने अब तक कहाँ छुपाके राखी थी यह रचना ?

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