शनिवार, दिसंबर 20, 2014

एक इमोशनल फ़ूल के कुछ मुश्किल पल और उसकी जकड़न

अगर मैंने दिवम पूछा-दिवम...आज आपके स्कूल में पाकिस्तान में पेशावर के आर्मी स्कूल में मारे जाने वाले बच्चों के लिए साइलेंस रखा गया था |तब मैंने ये नहीं कहा कि आपको मालूम है कि हमारे साइलेंस रखने पर या उन बच्चों के लिए संवेदना जताने पर कुछ लोगों का कहना है कि जब मुंबई में २६/११ का हमला हुआ तो क्या पाकिस्तानियों ने हमारे लिए संवेदना जताई थी जो हिन्दुस्तानी आँसू बहा रहे हैं और पाकिस्तानी भी इतने बदसूरत मंज़र के बात भी नहीं चेते हैं |

मुझे मालूम है एक बच्चा संवेदनायें दिल से महसूस करता है भले ही ‘संवेदना’ शब्द उस बच्चे के लिए समझना सबसे कठिन हो |

अगर बच्चों ने पूछा...मम्मा संसद किसे कहते हैं ? मैंने संसद के बारे में समझाते हुए ये बिलकुल नहीं बताया कि हमारे रीप्रिसेंटेटिव यहाँ हाथापाई भी करते हैं,गाली देते हैं कुर्सियां फेंकते हैं |

अगर कभी मैं बच्चों से धर्म के बारे में बात करूँगी तो यही कहूँगी कि तुम इंसानियत को अपना धर्म मानना लेकिन बचूँगी ये बताने से ‘कि जिस देश में तुम रहते हो वहाँ धर्म में अंधभक्ति सिखाई जाती है,सबसे ज़्यादा फ़साद धर्म की वजह से होते हैं,धर्म सबसे ज़्यादा लचीली चीज़ है जिसे जो चाहे अपने मतलब के लिए उसकी बुनियादें कमज़ोर कर सकता है’|

अगर उन्हें पैसे की क़ीमत समझाने के लिए एक झोपड़ी में फटे कपड़ों में खेलते बच्चों की तकलीफ़ें गिनवाउंगी तो मैं ये नहीं बताऊंगी कि इन्हें ग़रीब बनाये रखने के भी लोगों को क्या-क्या फ़ायदे हैं | 
  
अगर शिंजन की ज़िद है मम्मा ये रेड शाइनिंग वाले एप्पल लो न ? तो मैं ये कहूँगी..नहीं बेटा,ये वैक्स लगे हुए एप्पल हैं ये हेल्थ के लिए अच्छे नहीं हैं |लेकिन ये वैक्स लगे हुए क्यों हैं ?मैं ये शायद नहीं बताउंगी |

रोज़ाना ज़िन्दगी अक्सर ऐसे पॉज़ देती है जहाँ बिखरने के बाद संभलने का मौक़ा भी मिल ही जाता है |
अपने बच्चों का सुरक्षित और सुंदर दुनिया में बड़ा करने का ख़्वाब अब पूरी तरह टूटने लगा है | अब उन्हें कुछ बताने पर कुछ छुपा लेना बहुत ज़रूरी लगता है | अक्सर एक कहानी दोनों को सुनाती हूँ जिसमें मैं उन्हें एक चिड़िया के बच्चों का क़िरदार देती हूँ और वो मानते हैं कि वो एक चिड़िया के छोटे बच्चे हैं जिन्हें अभी पूरी तरह उड़ना नहीं आता,उनकी माँ उन्हें उड़ना सिखायेगी ,बचना सिखायेगी |लेकिन मुझे एक फ़िक्र है कि उनके लिए मेरा  ख़ुद का बनाया सुरक्षित घेरा उन्हें मजबूत नहीं होने देगा ,मैं सोचती थी बच्चों के दिल और मन की तरह उनकी दुनिया भी ख़ूबसूरत होनी चाहिए इसीलिए उनको सिक्के के दोनों पहलू दिखलाना बहुत मुश्किल लगता है |लेकिन दिखलाना तो है क्यों कि चिड़िया के ये छोटे बच्चे अब बड़े हो रहे हैं |

सबसे आसान अब ये लगता है कि एक ख़्वाब देखूँ जिसमें पूरी दुनिया को इरेज़र से मिटा कर एक नई दुनिया बसा लूँ .......बहुत अच्छी सी दुनिया जहाँ हम सब अपने अपने वक़्त को ख़ूबसूरती से जी पायें |


__________________________एक 'इमोशनल फ़ूल' के कुछ मुश्किल पल और उसकी जकड़न !!

 




बुधवार, अक्तूबर 29, 2014

फीलिंग नॉस्टॅल्जिक

'फीलिंग नॉस्टॅल्जिक फेसबुक पर कुछ दोस्त अपने स्टेटस में अक्सर इसे जोड़ कर अपनी यादें पोस्ट करते  है | मुझे दोस्तों की ये यादें,बातें सबसे बहुत सहज और अच्छी लगती हैं | 'नॉस्टेलजिया ' यानि ‘बीते वक़्त की याद’ |

स्मरणहीन के अलावा कोई ऐसा नहीं है जो यादें दोहराता न हो,हम अक्सर भूले बिसरे पल दोहराते हैं |फ़िर आज ऐसी कौन सी नई बात मैं लिखने बैठी हूँ यादों के बारे में ? ये मैंने ख़ुद से पूछा | शायद इसीलिए कि मुझे महसूस होता है कि जो हमारा आज है इसे याद करने वाले ज़रूर  होंगे लेकिन ये यादें इतनी पक्की या पुर सुकून न हों जितनी अब हैं या पहले थीं | 

मल्टीटास्किंग लोगों की बढ़ती गिनती ,सिर्फ़ ‘मैं और मेरा’ सर्वनाम जानने वाले लोग,ए फॉर एप्पल से पहले एस फॉर सक्सेस के सिखलाने वाले माँ पिता ,ग से ग्लोबलाइजेशन के आगे अपने ग से गाँव अपनी जड़ों को भूल जाने वाले लोग सिर्फ़ हासिल करने की कोशिश में  हैं पा लेने की नहीं | वो ये सब कर पाते हैं तो सिर्फ़ अपने हसरत और मंज़िल पर नज़र रखने के बाद ,कई यादें कई तहों में दबा लेने के बाद | क्यों कि आगे की रौशनी इन रोशनियों को मद्धम कर देने के बाद या एक याद बना देने के बाद ही ज़्यादा मालूम होती है | आगे बढ़ने के लिए ऐसा होना ज़रूरी भी है और नया तो पुराना होता ही है |

लेकिन न जाने क्यों, इस वक़्त में ऐसा लगता है कि वास्तव में हमें अपने पुराने को याद किये जाने की ज़्यादा ज़रुरत है | मशीनी दिनों के बाद कुछ बीती हुई लेकिन जिंदा यादों का दोहरना जब संजीवनी लगने लगे तो वाक़ई लगता है कि हमारा आज बीते कल से बेहतर नहीं है  |शायद इसीलिए अपने आज को साधने के लिए पुरानी यादें शेयर करने वाले लोग और अपनी परम्पराओं को फैशन में ही सही लेकिन दोहराने वाले लोगों की संख्या मुझे बढ़ती हुई लग रही है बनिस्बत पहले के |

वो चीज़ें जो भुला दी गयीं थीं और लग रहा था कि अब शायद ये 'म्यूज़ियम' में सजा दी जाएँगी ,ऐसा होते होते रह गया , मैंने सी पी के कई रेस्तरां का इंटीरियर बदला देखा है ,विदेशी ज़ायके लेते हुए लोग यहाँ के बदले देसी अदाज़ को पसंद कर रहे हैं , चीनी से बनी सफ़ेद और ऊपर पीले रंग के ढक्कन से ढँकी आचार की वरनी जिसे दादी अचार की लम्बी ज़िन्दगी के लिए सर्वोत्तम मानती थीं उन्हें अब इन्हीं रेस्तरां में कुछ स्टायलिश ढंग से रखा हुआ देखा जा सकता है ,दिल्ली में जब होती हूँ तो पंडारा में अक्सर मैं एक शुद्ध शाकाहारी रेस्तरां में जाना पसंद है वहाँ भी इस बार नज़ारा कुछ बदला बदला था ,वहाँ काँच की नाज़ुक क्रॉकरी की जगह स्टील की चकोर प्लेट्स और कटोरियों ने ले ली है | पक्के तौर पर इनके मालिकों ने  नॉस्टॅल्जिक शब्द की गहराईयों,उदासियों ,मुस्कुराहटों को ज़ेहन में बिलकुल न रखा हो लेकिन उनके यहाँ आने वाले लोगों का ज़ेहन ज़रूर इन पुरानी चीज़ों को देखकर किसी भी रूप में प्रतिक्रिया ज़रूर देता होगा |

इस वक़्त ऐसा लगता है जैसे सब के सब सिर्फ़ अपने लिए प्रतियोगिताएं आयोजित कर रहे हैं और अकेले ही पहले पायदान के लिए भाग रहे हैं और प्रेशर इतना रखते हैं कि इस रेस में उनके साथ न जाने कितने शामिल हों, ऐसे में किसे फ़ुर्सत है कि एक-एक पल को कीमती मान कर उसे भरपूर जिये और जो पल भरपूर नहीं जिया जाता वो भरपूर याद भी नहीं रहता | अगर यही रफ़्तार रही तो क्या वाक़ई हमारा आज जो हमारा कल होगा हमें उतना ही याद होगा जितना याद हमें बीता हुआ कल है ?शायद नहीं |

नॉस्टेलजिया ’ शब्द का अर्थ मालूम हो लेकिन उसे महसूस न कर पायें ,न  ही भागते भागते गुज़र रही ज़िन्दगी में बीते वक़्त को याद कर पायें इससे ज़्यादा ख़राब अपनी ख़र्च की गयी ज़िन्दगी का हिसाब क़िताब क्या होगा |

बहरहाल अब मैं कुछ ज़्यादा ही सोच रही हूँ ,अभी कुछ दिन पहले मैंने अपनी दादी की भतीजी यानि मेरी बुआ जी को फ़ोन मिलाया ,क्यों ? क्यों कि दादी एक कहानी सुनाती थीं जिसमे एक चुहिया की शादी गाँव के एक आदमी से हो जाती है वो चुहिया अपने पति से अपने ससुराल वालों की शिकायत की शुरुआत ‘तिक तिक’ कह कर और गाकर करती है ये सब दादी इतने मज़ेदार तरीके से सुनाती थीं कि हम उस कहानी को दिन कई कई बार सुनने की ज़िद करते थे ,बुआ जी ये कहानी बिलकुल उन्हीं की तरह सुनाती हैं ये कभी उनकी छोटी बहन ने मुझे बताया था |  तभी से मैं सोच रही थी कि उनसे ये कहानी सुनूँ और उसे रिकॉर्ड कर लूँ |कुछ ऐसी ही और कवायतें और भी जारी हैं |

शायद कुछ दिनों से मेरा भी स्टेटस ऑफ़ माइंड यही है ‘फ़ीलिंग  नॉस्टॅल्जिक' या शायद कुछ सहेज समेट लेने की ज़रुरत है या शायद उस वक़्त के बीत जाने का इस वक़्त अफ़सोस है |




शनिवार, अक्तूबर 18, 2014

मेरी आई बॉल्स पलकों में क़ैद हैं

तीन दिन बाद घर वापस आई हूँ ,आदतन इन दिनों आये अखबार खंगाले बिना मुझे चैन नहीं आता, ख़ास-ख़ास ख़बरें पढ़ रही हूँ और अब नींद भी आने लगी है |

स्पोंडिलाईटिस का दर्द पिछले कुछ दिनों से परेशान कर रहा है, और यूँ ही पढ़ते-पढ़ते अख़बार के दैनिक कॉलम पर मेरी नज़र गयी है पूरे कॉलम में बस यही बात को मैंने ढंग से  और दो बार पढ़ा है जहाँ डॉ.शिंडलर कहते हैं कि ‘डॉक्टर के पास जाने वालों में से ९९ प्रतिशत को कुछ नहीं हुआ होता है वे डॉक्टर के पास इसीलिए जाते हैं उन्हें अपनी भावनाओं को काबू करने की कला नहीं मालूम ,फिर उन्होंने ये भी बताया की बीमार घोषित किये गए लोगों में भी ज़्यादातर इसीलिए बीमार हैं क्योंकि उनके पास सकारात्मक विचार नहीं’ये पैरा को पढ़कर इसमें से मैंने अपने काम लायक सत निकाल लिया ,कि सोनरूपा तुम भी अपनी छोटी-छोटी तकलीफ़ों को नज़रंदाज़ करना सीखो |मैंने लाइट्स ऑफ कर दी हैं |लेकिन लेटते ही कई बातें नींद में ख़लल डाल रही हैं मेरे आई बॉल्स बंद पलकों में क़ैद हैं और आँखें खुलने का इंतज़ार कर रही हैं मुझे एक ही रास्ता सूझ रहा है कि बस लिख डालूँ,२ बज रहे हैं और मैं टाइप कर रही हूँ |

१५ तारीख़ को तिहाड़ जेल में एक कविसम्मेलन में जाना हुआ,वहाँ सिर्फ़ अपनी कविता सुनाते वक़्त ही शायद मैं अपने काव्यपाठ की ओर दिमाग लगा पाई बाक़ी जितनी देर मैं वहाँ रही सामने बैठे कैदियों के चेहरों पढ़ती रही ,मुझे लगा कि कुछ दुर्दान्त अपराधियों से अलग कुछ चेहरे सिर्फ़ एक पल की ग़लती से सज़ायाफ्ता हैं,कुछ चेहरे क़िस्मत के दगाबाज़ होने का दंश झेल रहे हैं ,और इस मन:स्तिथि को सही पढ़ लेने की मेरी कोशिश पर मुहर सी लगती दिखाई दी जब मैंने जेल में होने वाली प्रार्थना में उन चेहरों पर वही कहानियाँ गढ़ी हुई दिखाई दीं जो मेरा मन उनके लिए लिख रहा था|
मैं वापस घर आ गई थी लेकिन क्या सचमुच आ पाई थी ?

कभी-कभी एक पल ज़िन्दगी की सबसे बड़ी कहानी बन जाता है और कभी कभी एक कहानी को एक पल ख़त्म भी कर देता है |

इस वक़्त मुझे नींद न आने की वजह देर रात गीतकार संतोषानंद जी के बेटे-बहू का दर्दनाक अंत की ख़बर पढ़ लेना है|

अगर ज़िन्दगी ऊन के गोले की तरह उलझ जाये फिर सुलझा भी ली जाये इतना आसान कहाँ होता है,गीतकार संतोषानन्द जी के बेटे संकल्प और बहू नंदिनी के लिए सब कुछ इतना आसान नहीं रहा होगा , इसीलिए उन्होंने जान देकर इस पहेली को सुलझाना चाहा | एक कवि औरों से ज़्यादा संवेदनशील होता है और अगर वो औरों के दर्द पूरी शिद्दत के साथ लिख सकता है तो ज़ाहिर है अपना दर्द वो कभी नहीं भुला सकता ,ऐसे ही संतान के बिछोह से मिलने वाले दर्द के बाद एक बेहतरीन गीतकार संतोषानंद जी को ‘वक़्त का मरहम उनका ज़ख्म भरेगा’ जैसी तसल्ली देना सिर्फ़ रस्म अदायगी है और हमारा संतोष है |

इसी तरह एक मजदूर को कोटे दार से अनाज की बार-बार भीख माँगकर भी अनाज नहीं मिल पाया,बीवी बच्चों को भूख से कलपता कैसे देखता ? इसीलिए वो भी चल दिया संकल्प और नंदनी की राह पर| एक ये ख़बर और |

लेकिन ये जाने वाले लोग फिर एक प्रश्नपत्र हमारे हवाले कर गए , व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक खुली शिकायत दर्ज़ करवा गए |


ये भी सच है ऐसे पल ठहराव लाते हैं,इन पलों में कमरे की छत पर भी इबारत लिखी नज़र आ सकती है, लेकिन दुनिया से विरक्ति भी एक पल में होती है आसक्ति भी एक पल में|

..................................................................................................................कल रात |



सोमवार, अक्तूबर 13, 2014

ज़िन्दगी गोज़ ऑन

रघुपति सहाय 'फ़िराक'कहते हैं कि ‘वजूद में हमेशा बासी होने का ख़तरा रहता है’ और शायरी हमें बासी नहीं होने देती,वो हमें हमारी ज़िन्दगी वापस कर देती है’ |
सोचें तो अगर ज़िन्दगी अनिश्चित न होती तो हम कितने निश्चिंत होते और निश्चिंतता भी ज़िन्दगी को बासी कर देती है |

अब यहाँ शायरी और ज़िन्दगी दो अलग अलग बातें हैं,लेकिन समानांतर हैं क्यों कि न जाने कितनी ज़िंदगियाँ शायरी में जी ली जाती हैं |ज़िन्दगी का बयान ही तो होती हैं कवितायेँ ,शायरी|

पिछले कुछ दिनों से कुछ शाम छत पर टहलने का सबब हेल्थ के लिए अच्छा होने से इतर बादलों की आकृतियों को निहारना,अँधेरा होते ही कभी-कभी घर के सामने बगीचे में सिर्फ़ जुगुनुओं का झुरमुट देखने को मन होना ,रस्ते चलते बच्चे के सिर पर टीप मारकर उसे चौंक कर मुँह बनाते हुए देखना,दैनिक पूजा अर्चना से अलग बस कुछ देर कृष्ण के नाक नक्श को देखते रहना,कभी यूँ ही मन अपनी कोई पुरानी बनारसी साड़ी ठेठ देसी अंदाज़ में पहनने का बहाना ,पारदर्शी शीशे के वास में पनपे मनी प्लांट की बेल की जड़ इशारे करते हुए दिखाई देना और कहना मजबूत बनी रहना तभी ज़िन्दगी मेरे हरे पत्तों जैसी ख़ूबसूरत बनी रहेगी| 

ये सारी चाहतें क्या सही मायने में जी जाने वाली ज़िन्दगी से दूर जाने की वजह से हैं ?
अमीर कज़ल बाश का कहा हुआ याद आता है वो कहते हैं कि 
  
ज़िन्दगी तुझको मनाने निकले 
हम भी किस दर्जा दीवाने निकले 
 

इन अँधेरों में जियोगे कब तक 
कोई तो शम्मा जलाने निकले ....
लेकिन मेरे लिए ये छोटी छोटी चाहतें उस दर्ज़े के दीवाने पन तक पहुँचने से पहले ही संभल जाने की क़वायद हैं ?इतना लिखे जाने का अंत यही है ‘ज़िन्दगी सहज है इसे जटिल क्यों बनाया जाये’,ज़िन्दगी मुश्किल है तो ज़िन्दगी चैन भी है|   

ज़िन्दगी ने सहूलियतें दी हैं ये ख़ुशनसीबी है लेकिन सहूलियत का रस्ता भी बड़ा सीधा-सादा होता है और यहीं से  ज़िन्दगी में बासीपन का ख़तरा दिखाई देने लगता है |
जावेद साहब कहते हैं

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

तो बिलकुल सही फ़रमाते हैं
लेकिन उनके लिए ये बात सही जो इस बात से बावस्ता हैं और जिनके लिए सहूलियतों का रास्ता रोमांचक नहीं | 

रोज़ सोना रोज़ उठना ज़िन्दगी का ये दस्तूर निभा लेना कोई मुश्किल काम नहीं लेकिन सोने का बाद वाक़ई सोना और उठने के बाद वाक़ई उठना ज़िन्दगी के मैदान पर असल खेल है जो खेला जाना चाहिए और अगर ऐसी ज़िन्दगी के कुछ पल अपनी जायदाद बन जायें तो लगता है कि न जाने कितनी सदियों से अधूरी नींद को ठिकाना मिल जाये,आकाश में उगते सूरज से अलग एक सूरज हर सुबह पलकों में जग जाये |

हम जग जाएँ,संभल जायें,बह जायें |

मुझे किसी की चंद पंक्तियाँ याद आती हैं

बनी बनाई हुई राह चाहते हैं सब
बगैर काम के तनख्वाह हैं सब
समन्दरों में उतरने का दम किसी में नहीं
समन्दरों की मगर थाह चाहते हैं सब ये

ये ज़िन्दगी
लिखी जाती रहेगी लेकिन अधूरी रहेगी
ये पढ़ी जाती रहेगी लेकिन समझी न जाएगी
हम इससे नाराज़ भी होंगे इसके नाज़ भी उठायेंगे
पूर्णता के साथ ख़ालीपन आता है
और ख़ालीपन के साथ बासीपन
और बासीपन किसे भाता है तो फ़िर तो यही सच है कि
‘ज़िन्दगी गोज़ ऑन’ 
'ऐ ज़िन्दगी कीप मूविंग'.........................................................................सोनरूपा !!!


शुक्रवार, अक्तूबर 03, 2014

रविवार, सितंबर 21, 2014

बदलाव के संवाहक

अगर कोई व्यक्ति अपनी क्षमताओं को पहचान कर उसका उपयोग समाज की अच्छाई के लिए करे तो उससे अच्छा और स्मार्ट सिटीजन और कौन होगा ,निहाल सिंह हमारे शहर बदायूँ से ५० किलोमीटर दूर गाँव मुसिया नगला में रहते हैं ,इन्होनें अपने साथ ९९ किसानों को जोड़ कर और उन्हें जैविक खेती सिखा कर पर्यावरण और स्वास्थ्य की रक्षा में अपनी भागीदारी  सुनिश्चित की है ,मुझे जानकर बहुत अच्छा लगा कि एक सुविधाविहीन शहर में  कभी आर्थिक तंगी झेलते हुए जो पढाई के लिए कर्जदार हो गए आज उन्होंने अपना सफ़ल करीयर भी बनाया और जैविक खेती को अपनाया ,कैलीफ़ोर्निया की एक कम्पनी ने उन्हें बतौर सलाहकार नियुक्त किया है ये बहुत गर्व की बात है |

आजकल स्मार्ट सिटी बनाये जाने के लिए जाने की मुहिम ज़ोरों पर है ,किसी भी शहर को सिर्फ़ आधुनिकता से जोड़ना ही स्मार्ट सिटी का ख़ाका नहीं खींचता , अब तक की जानकारी के अनुसार शायद मेरे ज़हन में स्मार्ट सिटी की यही परिभाषा है ,आने वाले समय में जो भी विकास हो उसे एन्वायर्नमेंट फ्रेंडली होना बहुत ज़रूरी है स्मार्ट सिटी के अंतर्गत इंडस्ट्रीज़ को बढ़ावा ,वातानुकूलित शहर होना  इत्यादि पर्यावरण के लिए सिर्फ़ दुखदाई ही होंगे खैर इसके अलावा बढ़िया इन्फ्रास्टक्चर ,हाई टेक ,सुरक्षा आदि अन्य कई अच्छाईयों से भी लेस होंगी स्मार्ट सिटीज़, ऐसा सुना जा रहा है |

ये तो रही विकास की बात ,इसके अलावा स्मार्ट सिटी बनाने में सबसे मददगार फैक्टर स्मार्ट सिटीजन होना है |जिनका मैंने ऊपर ज़िक्र किया वो ऐसे ही स्मार्ट सिटीजन के दायरे में आते हैं ,सिर्फ़ आलोचना ,धार्मिक उन्माद,रीढ़विहीन चर्चाओं में लिप्त रहने वालों से इतर ऐसे लोग वास्तविक विकास के संवाहक हैं |

ऐसे लोग अन्जाने में हमें ख़ुद अपने गिरेवान में झाँकने के लिए भी इशारा करते हैं और प्रश्न भी करते हैं  ,कि आप बतायें आप समाज,देश के हित में क्या कर रहे हैं ?

ऐसा मेरे साथ भी हुआ है कई बार ,जब मैं इस प्रश्न के लिए ख़ुद को अनुत्तरित पाती हूँ ,मैं जानती हूँ कि मैं घर से निकल कर मुश्किल से ही किसी की हक़ की लड़ाई के लिए अपना योगदान दे पाती हूँ ,किसी आन्दोलन का चेहरा नहीं हूँ ,या किसी मुहिम में झंडाबरदार नहीं होती ,दिनों दिन बढ़ते जाने वाले दुष्कर्मों के लिए संवेदनाएँ अब मेरी कलम की नोंक पर आते आते रुक जाती हैं |मैं स्वीकार करती हूँ कि मेरे अंदर ऐसी ख़ासियत ,जूनून ,ज्वाला ,व्यक्तित्व नहीं है कि मैं बड़े बदलाव की संवाहक बन सकूँ |

फिर भी अगर टी. वी. जैसे मारक रोग से ग्रस्त किसी व्यक्ति के दिमाग से ऊपरी चक्कर का भूत उतार कर उसे और उस जैसे और रोगियों को ‘डॉट्स सेंटर’तक पहुँचा पाती हूँ तो ,जहाँ कहीं  भी फ़िज़ूल पानी का दोहन देख कर उसे रोकने का प्रयत्न करती हूँ तो ,डिसेबल्ड बच्चों के सर पर प्यार भरा हाथ फेर देती हूँ तो ,बिजली बचाने की मुहिम घर से शुरू करने वाली ‘मैं’ जब एक्स्ट्रा बिजली जलाने के लिए अपने ही बच्चे से डांट खाने लगती हूँ तो ,नए साल पर घर में दी गयी बच्चों की पार्टी में बच्चों से नए साल पर एक एक पौधा लगाने और उसकी सेवा का प्रॉमिस लेती हूँ तो ,अगले कुछ दिनों में नव दुर्गों में कन्या भोजन पर उपहार के साथ साथ एक एक पौधा देने का निश्चय करती हूँ तो ,कार में बैठ कर पानी की बोतलों और फ़ूड पैकेट्स को सड़क पर फेंकने के लिए अपने बेटे को सजा देती हूँ तो ,ज़िला जेल में सच्चे-झूठे आरोपों में फँसी महिला कैदियों के साथ बैठकर उनके हालातों से रूबरू होती हूँ तो ,जीवन से जुड़े रिश्ते चाहे वो किसी भी रूप में हों उन्हें संजोये रखने में अपने अहम् को एक तरफ़ रखने में कोई गरज नहीं रखती हूँ तो , आने वाले वक़्त के नौजवान यानि मेरे दोनों बेटों के अलावा मेरी बात का मान रखने वालों को औरत की इज्ज़त,औरत होने का मतलब ,औरत की अहमियत समझाने के लिए प्रयत्नशील रहती हूँ तो

 मैं भी इन छोटी-छोटी कोशिशों से ख़ुद को स्मार्ट सिटीजन मानती हूँ ,हो सकता है ये लेख पढ़ कर आपको ये शे’र याद आ जाये ‘दिल खुश रखने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है’या ये भी एक आत्मप्रचार का लेखा जोखा लगे |

एक दफ़ा मुझे भी लगा कि ये कहीं आत्मप्रचार न समझा जाये लेकिन  अगर मैं सोशल साइट्स पर अपनी कवितायें ,अपनी उपलब्धियां ,अपनी ग़ज़लें ,अपने प्रोफाइल पिक्चर्स शेयर करते समय भी यही सोचती तो ? मेरी पर्यावरण पर पहली कुछ पोस्ट पढ़कर मेरी एक मित्र जागरूक हुई तो बहुत अच्छा महसूस हुआ इसीलिए मैंने लोगों के सोचने न सोचने को महत्वपूर्ण माना ही  नहीं |

दैनिक जागरण के कार्यालय पर रोज़ाना ‘स्मार्ट सिटी स्मार्ट सिटीजन’ विषय पर विचार गोष्ठियाँ आयोजित हो रही हैं ,पढ़कर कर सुखद अनुभव होता है कि लोग जानते हैं कि स्मार्ट सिटी बनाये जाने के लिए क्या पहल होनी चाहिए ? इन्हें धरातल पर लाने के लिए हमारा प्रयासरत होना बहुत ज़रूरी है |

तम्बाकू,पॉलथीन,शराब हमारे प्रदेश में बैन नहीं हो पाई ,कारण क्यों कि राजस्व में कमी हो जाएगी इसीलिए न ?पानी का दोहन तभी रुकेगा जब पानी के कनेक्शन पर भी बिल आएगा लेकिन ऐसा करने के लिए गवर्मेन्ट को कौन रोकता है ? भूकंपरोधी घर ,रेन वॉटर हार्वेस्टिंग जैसे ज़रूरी क़दमों को न उठाकर कौन अपने की ख़िलाफ़ मुश्किलें खड़ी कर रहा है ? ऐसे बहुत ,बहुत सारे प्रश्नों का जवाब हमारे पास ही है बस जागृति का अभाव है |

अपने समाज की ,अपने देश की ,अपने पर्यावरण ,अपने व्यक्तित्व की भलाई जिसमें दिखे उसके लिए अपना पूरा समर्थन देना भी स्मार्ट सिटीजन होना है |
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शनिवार, अगस्त 02, 2014

नायाब तरीक़ा


हमारे देश में ज़िम्मेदार ओहदों पर विराजमान महानुभाव अक्सर बेतुके बयानात देते रहते हैं और इन मामलों को  तूल देकर ऐसे लोगों को पब्लिकली और ज़्यादा डीफेम करना दरअसल इनकी लोकप्रियता में इजाफ़ा करना होता है (इनके अनुसार बदनाम  हुए तो क्या ,नाम तो हुआ ) हमारे यहाँ सानिया मिर्ज़ा के तेलांगना की ब्रांड एम्बेसेडर बनने को लेकर आये बयान सुनकर लोग शॉर्ट  टेम्पर्ड दिखते है ,'दिल्ली मुंबई में यू पी, बिहार के लोगों के आने से वहां के हालात बदतर हो गये हैं' ये सुनकर लोगों का ब्लडप्रेशर हाई हो जाता है आदि आदि (ये हालिया बयान हैं वरना लिस्ट तो बहुत लम्बी है )

नुकसान किसका होता है ? ओव्यसली हमारा|

ऐसा ही एक बयान टर्की के उप प्रधान मंत्री ने दिया, उनके अनुसार ‘ स्त्रियों के सार्वजनिक जगहों पर हँसने से अनैतिकता को बढ़ावा मिलता है’ !इस बयान को सुनकर वहाँ सोशल मीडिया पर तीन लाख से ज़्यादा फ़ोटोज़ शेयर किये जा चुके हैं जिसमें लडकियाँ उस बयान पर अपनी हंसती हुई तस्वीरें पोस्ट कर रही हैं,ऐसे बयान देने वाले को शर्मिंदा करने का ये तरीक़ा बहुत नायाब है|


नायाब इसीलिए कि ये लोग बेसिर पैर की बातें करते हैं और हम अपना चैन खो बैठते हैं,इनका विरोध इस तरीक़े से किया जाना ज़्यादा अच्छा है

By Saying ‘TAKE A CHILL PILL’

है  न ?


सोमवार, जुलाई 28, 2014

मॉरिशस में कुछ यादगार दिन


आधारशिला प्रकाशन द्वारा विश्व हिंदी मिशन के रूप में विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन मॉरिशस में  २८ अक्टूबर से ३ नवम्बर तक हुआ मैं भी वहाँ आमंत्रित थी|
एक सार्थक प्रयास के लिए यानि हिंदी को संयुक्तराष्ट्र (यू इन ओ) की भाषा बनाने और हिंदी की बढ़ती व्यापकता से नई पीढ़ी को जोड़ने और उन तक अपनी बात को अपने वक्तव्यों ,कविताओं द्वारा संप्रेषित के लिए हमारे ३२ सदस्ययीय दल ने वहाँ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई |
पहले दिन का कार्यक्रम मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुईस में महात्मा गाँधी इंस्टिट्यूट में आयोजित हुआ वहाँ के सभी साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधिओं का केन्द इस इंस्टिट्यूट में, दो बार विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन हो चुका है |यहाँ के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मॉरिशस के उप प्रधानमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री (उत्तराखंड)श्री भगत सिंह कोशियारी एवं मॉरिशस के कला और संस्कृति मंत्री श्री मुकेश्वर चूनी उपस्तिथ रहे,मेरे द्वारा सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ ,मॉरिशस के अनेकों लेखकों,कवियों ,साहित्यकारों की उपस्तिथि ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की ,अनेक वक्तव्यों, पेंटिग प्रदर्शनी,पुस्तक प्रदर्शनी,पुस्तक विमोचन सम्मान समारोह से कार्यक्रम परिपूर्ण रहा,साथ ही आधार शिला फौंडेशन द्वारा महात्मा गाँधी इंस्टिट्यूट में आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम में मुझे साहित्य और गायन के क्षेत्र में युवा प्रतिभा के लिए कला संस्कृति मंत्री श्री मुकेश्वर चूनी एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भगत सिंह कोश्यारी ने ‘कला श्री सम्मान’ से सम्मानित किया गया ,अगले दिन हिंदी स्पीकिंग यूनियन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उनकी  अगले दिन सुबह से ही हम लोग मॉरिशस के सुंदर समंदर और कई दर्शनीय स्थल देखने निकले,उसमें मॉरिशस के राष्ट्रपति भवन में जाकर वहाँ के राष्ट्रपति से मुलाकात करना भी शामिल रहा ,हम सब के लिए ये एक यादगार अनुभव रहेगा हम सभी ने अपनी अपनी कृतियाँ उन्हें भेंट की और उन्हें अपने देश की और उनसे उनके देश में हिंदी के लिए किये गए प्रयासों की जानकारी ली फिर हम सब दोपहर बाद हिंदी स्पीकिंग यूनीयन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पंहुचे,स्वागत गीत से मैंने सभी का स्वागत किया ,आज भी कुछ वक्तव्य कार्यक्रम में शामिल थे और कुछ विमोचन भी , हिंदी स्पीकिंग यूनियन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मेरी ऑडियो एल्बम आपका साथ’ का माननीय कला संस्कृति मंत्री द्वारा विमोचन भी किया गया|वहीं मॉरिशस टी वी के लिए एक इंटरव्यू देने के लिए वहाँ के कला एवं संस्कृति विभाग के सलाहकार श्री गति जी ने अनुरोध किया ,खैर इंटरव्यू के बाद हम सब रेसोर्ट के लिए रवाना हो गए |
अगले दिन हम सबका प्लान था शौपिंग पर जाने का ,बस में बैठते ही कला एवं संस्कृति मंत्रालय से श्री गति जी का फोन आ गया जो मेरे लिए मिनिस्ट्री ऑफ आर्ट एंड कल्चर द्वारा मॉरिशस के इतिहास के अविस्मरणीय दिवस यानि २ नबम्बर २०१२ को अप्रवासी घाट पर आयोजित एक राष्ट्रीय कार्यक्रम जो मॉरिशस में आये बंधुआ मजदूरों के आगमन की १७८ वीं वर्षगाँठ पर आयोजित था ,में कविता पाठ के लिए आमंत्रण था |मैं जिस देश के इतिहास को बहुत बारीकी से जानती ही नहीं थी उस पर कविता पढ़ना थोड़ा कठिन लगा लेकिन फिर सोचा चलिए देखते हैं ,मुझे श्री मुकेश्वर चूनी जी ने एक अतुकांत कविता की कुछ पंक्तियाँ दी और कहा आप इस से कुछ क्लू लेकर इसे अपने शब्दों में लिखकर अपने स्वर में एवं लय में बांध दीजिए ,मैंने एक दो घंटे लगाकर इसको तैयार कर लिया  अगले दिन सुबह दस बजे कार्यक्रम की शुरुआत हुई ,कार्यक्रम की अध्यक्षता मॉरिशस के राष्ट्रपति श्री राजकेश्वर पुर्याग ने की मुख अतिथि मॉरिशस के प्रधानमंत्री श्री डॉ.नवीनचन्द्र रामगुलाम रहे,कार्यक्रम में कई अन्य देशों के राजदूत समेत देश के गणमान्य नागरिक भी उपस्थित थे उन सभी की उपस्तिथि में कविता द्वारा मॉरिशस के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख एक यादगार अनुभव रहा ..........
साथ ही इतने सुनाम नाम धन्य ,गुणीजनों ,विद्वानों के सानिध्य ने ये सात दिन मेरे लिए अनमोल बना दिए !


बुधवार, जुलाई 23, 2014

समीक्षा'लिखना ज़रूरी है'



प्रसिद्ध  ब्लॉगर मनीष कुमार जी ने मेरे ग़ज़ल संग्रह'लिखना ज़रूरी है' की विस्तृत समीक्षा की है

 अपने आप को व्यक्त करने की इच्छा हम सबमें से बहुतों की होती है। कभी जब ये कसक ज़रा ज्यादा जोर मारती है तो हम काग़ज़ के पन्नों को रंगते हैं और फिर भूल जाते हैं। पहले तो अपना लिखा देखकर ये लगता है भला इसे पढ़ेगा कौन? फिर ये भी लगता है कि अगर किसी ने पढ़ लिया और एक सिरे से ख़ारिज़ कर दिया तो फिर इस तरह नकारे जाने का दर्द ना जाने कब तक मन को टीसता रहेगा। कुछ दिनों पहले  कैफ़ी आज़मी से जुड़ा संस्मरण बाँटते समय बताया था कि ये झिझक और बढ़ जाती है जब अपने ही घर में लिखने पढ़ने वाले इतना नाम कमा गए हों कि उनके सामने अपनी हर कृति बौनी लगे। इसी संकोच की वज़ह से बहुतेरे अपने को कम आँकते हुए उसे सबके सामने लाने की ज़हमत नहीं करते और कुछ क़ैफी जैसे होते हैं तो हर उस मौके, उस दबाव को ध्यान में रखते हुए अपने हुनर का इम्तिहान देने से ज़रा भी नहीं कतराते।

सोनरूपा विशाल के पहले ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह 'लिखना ज़रूरी है' को भी इसी परिपेक्ष्य में देखना जरूरी है। लेखिका की पहचान एक ख्याति प्राप्त गीतकार कवि उर्मिलेश की सुपुत्री और एक ग़ज़ल गायिका की रही है। लेखिका भी इस पुस्तक को पाठकों के सम्मुख रखने से पहले उन्हीं मनोभावनाओं से गुजरी हैं जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया है इसीलिए पुस्तक की प्रस्तावना में उनकी ये झिझक साफ दिखाई देती है जब वो लिखती हैं..
मैं वाकई इतनी काबिलियत नहीं रखती कि ग़ज़ल और ग़ज़लकारों की विराट परंपरा की फेरहिस्त में अपनी छोटी सी लेखन यात्रा से ख़ुद को एक संग्रह के माध्यम से खड़ा कर सकूँ। बस इतना मान लीजिए कि ये ग़ज़लें मेरी एहसास की शिद्दत हैं, मेरे रंग, कुछ देखे समझे तमाशे, धुँध में से रौशनी देखने की हसरत, निजत्व की तलाश, आसपास का परिवेश, विसंगतियाँ, जज़्बात, शिकन, हरारतें हैं।
ये भी है कि जो अपने अंदर की आवाज़ को समझ पाते हैं उनकी लेखनी पर ज्यादा विराम नहीं लग सकता। सोनरूपा ने अपनी इस फ़ितरत को समझा और इसीलिए वो लिखती हैं

मेरे जज़्बात को स्याही का रंग मिलना जरूरी है
मुझे रहना हो गर ज़िंदा तो फिर लिखना जरूरी है

पिता मेरे मुकम्मल थे हर इक अंदाज़ में लेकिन
तो थोड़ा इल्म उनका भी मुझे मिलना जरूरी है

इस संकलन में सोनरूपा की लिखी सौ के करीब ग़ज़लें और नज़्मे हैं जिनमें एक चौथाई हिस्सा नज़्मों का है। उनकी भाषा में एक सहजता है। पर इसी सहजता से अपने अशआरों में वो जगह जगह मानवीय भावनाओं का आकलन करती चलती हैं। मिसाल के तौर पर छोटी बहर के इन अशआरों पर गौर फ़रमाएँ

जो हर पल हँसते रहते हैं
उनके दिल सुनसान समझिए

रोज चुभेंगे काँटे दिल में
फूलों से नुकसान समझिए

और उनकी इस सोच को आप या मैं शायद ही कोई नकार सके। ज़िदगी के ये अनुभव यूँ तो हम सबने जिये हैं पर जब वो इन शेरों की शक़्ल ले कर हमसे टकराते हैं तो उनका असर कुछ और होता है।

परेशाँ जब भी होते हैं. ख़ुदा के पास आते हैं
नहीं तो एक मूरत है ये कह के भूल जाते हैं

किसी सूरत भी अपना हाले दिल उनसे नहीं कहना
ये रो रोकर जो सुनते हैं, वही हँस हँस उड़ाते हैं

और उनके ये शेर तो खास दाद का हक़दार है

कई अंदाज़ रखते हैं कई किरदार जीते हैं
यही आदत उन्हें ख़ुद से मिलने नहीं देती


हम कुछ भी लिखते हैं तो उसे लिखते समय मन में कोई ना कोई रहता ही है पर फिर सारी चतुराई इस बात पर भी रहती है कि अपनी अभिव्यक्ति के चारों ओर शब्दों का वो जाल बुने कि अगला समझते हुए भी असमंजस में रहे। तब भी लिखने वाले की वही उम्मीद रहती है जो सोनरूपा की है..

मेरे अशआर तुम समझ लेना
अपना किरदार तुम समझ लेना

जिसने सोचा न हो नफ़ा नुकसान
वो खरीदार तुम समझ लेना

सोनरूपा की लेखनी में कहीं दार्शनिकता का पुट है

ये बच्चे ये मकाँ, ये मालो दौलत सब है मुट्ठी में
मगर मिट्टी ही आख़िर में मेरा तेरा ठिकाना है

जिनको दर सस्ती लगे एहसास की
उनकी कीमत भी गिरानी चाहिए
इक कलंदर ने हमें समझा दिया
ज़िंदगी कैसे बितानी चाहिए

सच्चाई तो कछुए जैसी चलती है
झूठे किस्से पानी जैसे बहते हैं

तो कहीं रूमानियत से भरे एहसास भी

हमसफ़र हमनवाँ सा लगता है
चाँद अब आशना सा लगता है
देखने में तो कोरा काग़ज़ है
और सब कुछ लिखा सा लगता हैउनकी एक ग़ज़ल तो बेज़ान सी लगने वाली खिड़कियों को समर्पित है। प्रेम, प्रतीक्षा, हिंसा और बाहरी दुनिया से एक सेतु के रूप में देखा है उन्होंने इन खिड़कियों को अपनी ग़ज़ल में। अपनी बात करूँ तो इन झरोखों की वज़ह से मेरे दिल के रोशनदान को कई बार उम्मीदों की धूप सेंकने का अवसर मिला है इस लिए ये शेर मुझे बेहद अपना सा लगता है जब लेखिका कहती हैं

गुनगुनाती मुस्कुराती खिड़कियाँ
इश्क़ का जादू जगाती खिड़कियाँ

और अगला शेर पढ़ते हुए दंगों के बीच अपने शहर का वो दिन याद आ जाता है

हर तरफ़ सड़कों पर वो कोहराम है
डर से जिसके सहम जाती खिड़कियाँ

ये तो हुई ग़ज़लों की बातें। इस किताब में सोनरूपा की दो दर्जन नज़्में भी शामिल हैं। अगर ईमानदारी से कहूँ तो उनकी लिखी नज़्मों में मुझे उनकी ग़ज़लों से ज्यादा प्रभावित किया। नज़्मों में लेखिका के व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। इन नज़्मों में वो अपने उन सभी रंगों में नज़र आती हैं जिसे उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों पर जिया है। कुछ नज़्मों का खास जिक्र करना चाहूँगा। अपनी माँ के प्रति कृतज्ञता को वो प्यारे अंदाज़ में यूँ व्यक्त करती हैं।बुहार देती हो तुम
हर दर्द मेरा
बिखरती हूँ मैं
जब भी
तुम्हारे आगे
पत्ते की तरह !

उनकी नज़्म 'आसानियाँ भी दुश्वारियाँ हैं..' में भौतिक सुख सुविधाओं के बीच पली बढ़ी एक स्त्री के मन का कचोट सामने आता है। ये प्रश्न लेखिका को सालता है कि जीवन के कष्टों को बिना ख़ुद झेले हुए क्या कोई उस वर्ग का दुख समझ सकता है। एक छोटी बच्ची के साथ हुए बलात्कार पर व्यथित हृदय से लिखी उनकी नज़्म 'तुम ....' मन को झकझोर जाती है। वहीं दूसरी तरफ़ 'अल्हड़ लड़की का चाँद' में चाँद के साथ किशोरी की गुफ्तगू को पढ़कर मन ठेठ रूमानियत के धागों में बँधा चला जाता है। आपको यकीन नहीं होता तो आप ख़ुद ही लेखिका की आवाज़ में इसे सुन कर देखिए....

खुल गई अंबर की गाँठ
छिटके तारे और
बादलों के नाजुक से फाहों के बीच से
उतरे तुम
रात के चमकीले शामियानों के सजीले चितचोर
रात की झिलमिल झील की पतवार
दुनिया भर की प्रेम कथाओं के कोहीनूर..ओ चाँद....


http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.in/2014/04/likhna-zaroori-hai.html



मंगलवार, जुलाई 15, 2014

किरणें


न्यूज़ चैनल्स की क्लिपिंग्स से मालूम चलता है कि गाज़ियाबाद के एक फाइव स्टार होटल की ओपनिंग सेरेमनी में होटल मालिक किसी नामी गिरामी राजनेता ,फिल्म स्टार या किसी और बड़ी हस्ती को न बुलाकर किसी अनाथालय के ख़ूब सारे बच्चों को चीफ़ गेस्ट बनाते हैं जहाँ बच्चे महँगी घास से ग्रीन हुए लॉन में मन भर कर उछल कूद करते हैं और पेट भर कर नाज़ुक क्राकरी में खाते हैं
तब
जब चेन्नई में गंभीर रूप से बीमार एक २१ साल की युवती के जल्दी से जल्दी हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए पुलिस और चेन्नई के नागरिक ट्रेफिक को एक जगह जाम कर देते है जिससे उसका ट्रीट मेंट समय पर संभव हो पाता है
तब
जब एक आई टी कम्पनी में काम करने वाला युवक अपनी पहली तनख्वाह से रोड पर लावारिस घूमने वाले बच्चों को मन भर कर मेक्डोनाल्ड में पिज़्ज़ा बर्गर खिलाता है 
 तब
जब एक रईस बिज़नेसमैन सुबह-सुबह गुरूद्वारे जाकर वहाँ आने वाले लोगों के जूते साफ़ करता है और मन में  संतोष का एहसास लेकर अपनी आलीशान कार में बैठ कर ऑफिस का रुख़ करता है और ये वीडियो सोशल साइट्स पर लाखों लोग देखते हैं और लाखों बार ‘हैट्स ऑफ’ लिख कर उसे शेयर करते हैं
तब
जब मेरे पास एक इंजीनियरिंग के छात्र का फ़ोन आता है और वो मुझसे कहता है ‘मैडम आई हव गौट युअर नंबर फ्रॉम अ ब्लड सेंटर ..हम पढाई करने के बाद बचा हुआ समय एक कैंसर हॉस्पिटल को देते हैं जहाँ हम ग़रीब कैंसर  पेशेंट्स के इलाज के लिए फंड्स इकठ्ठा करते हैं ,कैन यू हेल्प अस ,हम आपको अपने बारे में डिटेल एक मेल के थ्रू भेज रहे हैं जब आप निश्चिंत हो जाएँ तब हमारी मदद करें ,और वाक़ई में मेल देख कर उनका निस्वार्थ सेवाभाव मन को छू जाता है  
तब
आज के वक़्त,आज के दौर,आज के लोग,आज की पीढ़ी को संवेदनहीन कहना,लिखना और मानना वास्तव में जजमेंटल होना लगता है ये भी एक ज्यादती है जो अक्सर हम कर जाते हैं !



रविवार, जून 15, 2014

यादों का फलैश बैक

शायद पाँचवी क्लास की स्टूडेंट थी जब मुझसे क्लास में कहा गया कि ‘आपको एक ऐसा कार्ड बना कर लाना है जिससे हमें कोई अच्छी शिक्षा मिलती हो’!मुझ पर ज़्यादा आईडियाज़ तो नहीं थे , लेकिन ‘मेरा चार्ट सबसे सुंदर हो’ वाली सोच तो थी ! कुछ नहीं समझ में आया तो सोचा मम्मी से कहूँ,जब कि मुझे उन का उत्तर पता था ‘बेटा ख़ुद किया करो अपना काम’ |
इतने में पापा बोले ‘लाओ मैं बनाता हूँ’ मेरे लिए आश्चर्य था क्यों कि वक़्त की कमी की वजह से कभी-कभार ही ऐसा होता था कि पापा हमारा पढाई से रिलेटिड को बात किया करते थे , खैर मैं ख़ुश हो गयी पापा ने एक आर्ट पेपर माँगा उसको दो हिस्सों में मोड़ कर उन्होंने बस तीन पिलर बना दिये पहला सबसे ऊँचा, दूसरा उससे कम, तीसरा उससे भी कम फिर तीनों को अलग अलग रंगों से रंग दिया और तीनों पर लिख दिया ‘पहले देश ,फिर माँ फिर और कुछ”
मैं कुछ अनमनी सी हो गयी लेकिन उनको बिना जताए और बताए,उस कार्ड में मुझे कुछ भी बहुत सुंदर नहीं लगा मैंने सोचा 'ये कैसा कार्ड है जिसमे बस तीन लाइनें हैं',मैंने बुझे मन से अपने बैग में रख लिया !टीचर को दिखाया या नहीं ये तो याद नहीं! लेकिन जब धीरे धीरे बुद्धि ने थोड़ा विस्तार पा लिया तब महसूस हुआ कि इसमें कितनी गहरी बात थी |
आज जब शिंजन के साथ उनके होलीडे होमवर्क में हेल्प करने बैठी तो ये वाक़या याद आ गया, बिलकुल वैसा ही कार्ड शिंजन को बना के दिया है ,देखना है क्या रेस्पोंस मिलता है और मन भी है कि शिंजन के ज़रिये से अपने बचपन का फ्लैशबैक देख लूँ !
ज़िन्दगी में आगे भी न जाने कितने ऐसे ज़रियों से पापा ने हम तीनों भाई बहनों में संस्कार और दायित्व बोये !थैंक यू पापा फॉर एव्री थिंग्स |
आज आप का मुक्तक आपके लिए हम तीनों की तरफ़ से------------
नीम  होकर मिठास देते हैं
ख़ुद झुलस कर सुवास देते हैं
वो पिता ही हैं उम्र भर हमको
उत्तरोत्तर विकास देते हैं


बुधवार, अप्रैल 23, 2014

चलते फिरते

दो दिन पहले जी आई पी मॉल के सामने मैं आइस क्रीम से पार्ट टाइम ठंडी एन्जॉय कर रही थी कि वहां मौजूद ज़ी न्यूज़ की संवाददाता ने राय जानने के लिए मेरे आगे माइक कर दिया'३० सेकंड्स में आप हमें बता सकती हैं कि क्या आम महिलाओं के लिए राजनीति में आना मुश्किल है ?अगर वो आती भी हैं तो उनके फ़ैसले उनके नहीं होते,क्या उनकी वजाय उनके पति या उनके राजनीतिक अभिभावक उनके थ्रू रूल करते हैं ? 

मैंने उनसे कहा- मैडम ये भी कोई पूछने की बात है , हम स्त्रियों के साथ तो मुश्किलें गर्भ से ही दोस्ती निभाती आ रही हैं बात कीजिये दूसरी वो ये कि 'हमारे यहाँ कौन सी गवर्नमेंट ऐसी है जिसका ख़ुद का रूल चलता हो!कोई भी फ़ैसला लिखा एक पेन से जाता है लेकिन स्याही देने वाले इस शर्त के साथ स्याही सप्लाई करते हैं कि"हमारा भी ध्यान रखना"!

इस पर वो संवाददाता बोली कि आप बस वो ही बोलिए जो हम चाहते हैं !
मैंने कहा ..चलिए बोलते हैं कीजिये कैमरा ऑन !

मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

गुफ़्तगू

अपने दोस्तों को अलग-अलग नामों से पुकारे जाने की, चिढने-चिढ़ाने की परम्परा है बचपन की  ,मैं भी अजब-गज़ब नामों से अपने दोस्तों को आवाज़ देती थी ,मुझे उस वक़्त आज की तरह  फ़िक्र कहाँ थी कि उस दोस्त को बुरा लगा या भला ?सच्ची मुच्ची ,कच्ची पक्की जैसे शब्दों में हमारी दोस्ती फुटबॉल खेलती रहती थी !
कल रात ऐसे ही मैंने दोस्तों की यादों के  साथ बचपन की पिच पर फुटबॉल  मैच खेल रही थी कि चाँद ने आवाज़ दी और बोला ........"सुनो मेरा भी एक दोस्त है उसका नाम है गुलज़ार,वो ७६ साल का है और मैं हजारों साल पुराना, तुम्हारी तरह वो भी मुझे बहुत सारे नाम देता है !उससे नाराज़ होना तो दूर मैं तो उसके कंधे पर हाथ रखकर उसकी ख़ुशामद करते हुए अक्सर कहता हूँ यार गुलज़ार तुम ही जो मुझे बूढ़ा नहीं होने देते,तुम अब भी मुझसे करतब करवाते हो ,जब चाहे किसी भी सांचे में मुझे ढाल देते हो और मैं उफ़ भी नहीं करता"!
मैंने भी चाँद से एटीट्यूड से  कहा "  ओ चाँद ,मुझे भी अपनी फ़ेरहिस्त में शामिल करो क्यों कि मैंने भी अपने कई लम्हे गुलज़ार के लफ़्ज़ों के बैंक  में फिक्स डिपाज़िट करवा दिए हैं" !
- गुलज़ार साहब आपको  दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिलने की मिश्री सी मीठी-मीठी बधाई और शुक्रिया |इन दिनों आपकी चर्चायें  बर्फ़ की चुस्की जैसी तो हैं तोरई की बेरौनक सब्ज़ी जैसी चुनावी चर्चाओं के बीच !!



चाँद के साये बालिश्तों से नापे हैं 
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में ..............................................!