मंगलवार, अप्रैल 15, 2014

गुफ़्तगू

अपने दोस्तों को अलग-अलग नामों से पुकारे जाने की, चिढने-चिढ़ाने की परम्परा है बचपन की  ,मैं भी अजब-गज़ब नामों से अपने दोस्तों को आवाज़ देती थी ,मुझे उस वक़्त आज की तरह  फ़िक्र कहाँ थी कि उस दोस्त को बुरा लगा या भला ?सच्ची मुच्ची ,कच्ची पक्की जैसे शब्दों में हमारी दोस्ती फुटबॉल खेलती रहती थी !
कल रात ऐसे ही मैंने दोस्तों की यादों के  साथ बचपन की पिच पर फुटबॉल  मैच खेल रही थी कि चाँद ने आवाज़ दी और बोला ........"सुनो मेरा भी एक दोस्त है उसका नाम है गुलज़ार,वो ७६ साल का है और मैं हजारों साल पुराना, तुम्हारी तरह वो भी मुझे बहुत सारे नाम देता है !उससे नाराज़ होना तो दूर मैं तो उसके कंधे पर हाथ रखकर उसकी ख़ुशामद करते हुए अक्सर कहता हूँ यार गुलज़ार तुम ही जो मुझे बूढ़ा नहीं होने देते,तुम अब भी मुझसे करतब करवाते हो ,जब चाहे किसी भी सांचे में मुझे ढाल देते हो और मैं उफ़ भी नहीं करता"!
मैंने भी चाँद से एटीट्यूड से  कहा "  ओ चाँद ,मुझे भी अपनी फ़ेरहिस्त में शामिल करो क्यों कि मैंने भी अपने कई लम्हे गुलज़ार के लफ़्ज़ों के बैंक  में फिक्स डिपाज़िट करवा दिए हैं" !
- गुलज़ार साहब आपको  दादा साहब फाल्के पुरस्कार मिलने की मिश्री सी मीठी-मीठी बधाई और शुक्रिया |इन दिनों आपकी चर्चायें  बर्फ़ की चुस्की जैसी तो हैं तोरई की बेरौनक सब्ज़ी जैसी चुनावी चर्चाओं के बीच !!



चाँद के साये बालिश्तों से नापे हैं 
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में ..............................................!




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