सोमवार, जुलाई 28, 2014

मॉरिशस में कुछ यादगार दिन


आधारशिला प्रकाशन द्वारा विश्व हिंदी मिशन के रूप में विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन मॉरिशस में  २८ अक्टूबर से ३ नवम्बर तक हुआ मैं भी वहाँ आमंत्रित थी|
एक सार्थक प्रयास के लिए यानि हिंदी को संयुक्तराष्ट्र (यू इन ओ) की भाषा बनाने और हिंदी की बढ़ती व्यापकता से नई पीढ़ी को जोड़ने और उन तक अपनी बात को अपने वक्तव्यों ,कविताओं द्वारा संप्रेषित के लिए हमारे ३२ सदस्ययीय दल ने वहाँ अपनी मौजूदगी दर्ज कराई |
पहले दिन का कार्यक्रम मॉरिशस की राजधानी पोर्ट लुईस में महात्मा गाँधी इंस्टिट्यूट में आयोजित हुआ वहाँ के सभी साहित्यिक सांस्कृतिक गतिविधिओं का केन्द इस इंस्टिट्यूट में, दो बार विश्व हिंदी सम्मलेन का आयोजन हो चुका है |यहाँ के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में मॉरिशस के उप प्रधानमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री (उत्तराखंड)श्री भगत सिंह कोशियारी एवं मॉरिशस के कला और संस्कृति मंत्री श्री मुकेश्वर चूनी उपस्तिथ रहे,मेरे द्वारा सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ ,मॉरिशस के अनेकों लेखकों,कवियों ,साहित्यकारों की उपस्तिथि ने कार्यक्रम को गरिमा प्रदान की ,अनेक वक्तव्यों, पेंटिग प्रदर्शनी,पुस्तक प्रदर्शनी,पुस्तक विमोचन सम्मान समारोह से कार्यक्रम परिपूर्ण रहा,साथ ही आधार शिला फौंडेशन द्वारा महात्मा गाँधी इंस्टिट्यूट में आयोजित दो दिवसीय कार्यक्रम में मुझे साहित्य और गायन के क्षेत्र में युवा प्रतिभा के लिए कला संस्कृति मंत्री श्री मुकेश्वर चूनी एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री श्री भगत सिंह कोश्यारी ने ‘कला श्री सम्मान’ से सम्मानित किया गया ,अगले दिन हिंदी स्पीकिंग यूनियन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उनकी  अगले दिन सुबह से ही हम लोग मॉरिशस के सुंदर समंदर और कई दर्शनीय स्थल देखने निकले,उसमें मॉरिशस के राष्ट्रपति भवन में जाकर वहाँ के राष्ट्रपति से मुलाकात करना भी शामिल रहा ,हम सब के लिए ये एक यादगार अनुभव रहेगा हम सभी ने अपनी अपनी कृतियाँ उन्हें भेंट की और उन्हें अपने देश की और उनसे उनके देश में हिंदी के लिए किये गए प्रयासों की जानकारी ली फिर हम सब दोपहर बाद हिंदी स्पीकिंग यूनीयन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पंहुचे,स्वागत गीत से मैंने सभी का स्वागत किया ,आज भी कुछ वक्तव्य कार्यक्रम में शामिल थे और कुछ विमोचन भी , हिंदी स्पीकिंग यूनियन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में मेरी ऑडियो एल्बम आपका साथ’ का माननीय कला संस्कृति मंत्री द्वारा विमोचन भी किया गया|वहीं मॉरिशस टी वी के लिए एक इंटरव्यू देने के लिए वहाँ के कला एवं संस्कृति विभाग के सलाहकार श्री गति जी ने अनुरोध किया ,खैर इंटरव्यू के बाद हम सब रेसोर्ट के लिए रवाना हो गए |
अगले दिन हम सबका प्लान था शौपिंग पर जाने का ,बस में बैठते ही कला एवं संस्कृति मंत्रालय से श्री गति जी का फोन आ गया जो मेरे लिए मिनिस्ट्री ऑफ आर्ट एंड कल्चर द्वारा मॉरिशस के इतिहास के अविस्मरणीय दिवस यानि २ नबम्बर २०१२ को अप्रवासी घाट पर आयोजित एक राष्ट्रीय कार्यक्रम जो मॉरिशस में आये बंधुआ मजदूरों के आगमन की १७८ वीं वर्षगाँठ पर आयोजित था ,में कविता पाठ के लिए आमंत्रण था |मैं जिस देश के इतिहास को बहुत बारीकी से जानती ही नहीं थी उस पर कविता पढ़ना थोड़ा कठिन लगा लेकिन फिर सोचा चलिए देखते हैं ,मुझे श्री मुकेश्वर चूनी जी ने एक अतुकांत कविता की कुछ पंक्तियाँ दी और कहा आप इस से कुछ क्लू लेकर इसे अपने शब्दों में लिखकर अपने स्वर में एवं लय में बांध दीजिए ,मैंने एक दो घंटे लगाकर इसको तैयार कर लिया  अगले दिन सुबह दस बजे कार्यक्रम की शुरुआत हुई ,कार्यक्रम की अध्यक्षता मॉरिशस के राष्ट्रपति श्री राजकेश्वर पुर्याग ने की मुख अतिथि मॉरिशस के प्रधानमंत्री श्री डॉ.नवीनचन्द्र रामगुलाम रहे,कार्यक्रम में कई अन्य देशों के राजदूत समेत देश के गणमान्य नागरिक भी उपस्थित थे उन सभी की उपस्तिथि में कविता द्वारा मॉरिशस के गौरवशाली इतिहास का उल्लेख एक यादगार अनुभव रहा ..........
साथ ही इतने सुनाम नाम धन्य ,गुणीजनों ,विद्वानों के सानिध्य ने ये सात दिन मेरे लिए अनमोल बना दिए !


बुधवार, जुलाई 23, 2014

समीक्षा'लिखना ज़रूरी है'



प्रसिद्ध  ब्लॉगर मनीष कुमार जी ने मेरे ग़ज़ल संग्रह'लिखना ज़रूरी है' की विस्तृत समीक्षा की है

 अपने आप को व्यक्त करने की इच्छा हम सबमें से बहुतों की होती है। कभी जब ये कसक ज़रा ज्यादा जोर मारती है तो हम काग़ज़ के पन्नों को रंगते हैं और फिर भूल जाते हैं। पहले तो अपना लिखा देखकर ये लगता है भला इसे पढ़ेगा कौन? फिर ये भी लगता है कि अगर किसी ने पढ़ लिया और एक सिरे से ख़ारिज़ कर दिया तो फिर इस तरह नकारे जाने का दर्द ना जाने कब तक मन को टीसता रहेगा। कुछ दिनों पहले  कैफ़ी आज़मी से जुड़ा संस्मरण बाँटते समय बताया था कि ये झिझक और बढ़ जाती है जब अपने ही घर में लिखने पढ़ने वाले इतना नाम कमा गए हों कि उनके सामने अपनी हर कृति बौनी लगे। इसी संकोच की वज़ह से बहुतेरे अपने को कम आँकते हुए उसे सबके सामने लाने की ज़हमत नहीं करते और कुछ क़ैफी जैसे होते हैं तो हर उस मौके, उस दबाव को ध्यान में रखते हुए अपने हुनर का इम्तिहान देने से ज़रा भी नहीं कतराते।

सोनरूपा विशाल के पहले ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह 'लिखना ज़रूरी है' को भी इसी परिपेक्ष्य में देखना जरूरी है। लेखिका की पहचान एक ख्याति प्राप्त गीतकार कवि उर्मिलेश की सुपुत्री और एक ग़ज़ल गायिका की रही है। लेखिका भी इस पुस्तक को पाठकों के सम्मुख रखने से पहले उन्हीं मनोभावनाओं से गुजरी हैं जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया है इसीलिए पुस्तक की प्रस्तावना में उनकी ये झिझक साफ दिखाई देती है जब वो लिखती हैं..
मैं वाकई इतनी काबिलियत नहीं रखती कि ग़ज़ल और ग़ज़लकारों की विराट परंपरा की फेरहिस्त में अपनी छोटी सी लेखन यात्रा से ख़ुद को एक संग्रह के माध्यम से खड़ा कर सकूँ। बस इतना मान लीजिए कि ये ग़ज़लें मेरी एहसास की शिद्दत हैं, मेरे रंग, कुछ देखे समझे तमाशे, धुँध में से रौशनी देखने की हसरत, निजत्व की तलाश, आसपास का परिवेश, विसंगतियाँ, जज़्बात, शिकन, हरारतें हैं।
ये भी है कि जो अपने अंदर की आवाज़ को समझ पाते हैं उनकी लेखनी पर ज्यादा विराम नहीं लग सकता। सोनरूपा ने अपनी इस फ़ितरत को समझा और इसीलिए वो लिखती हैं

मेरे जज़्बात को स्याही का रंग मिलना जरूरी है
मुझे रहना हो गर ज़िंदा तो फिर लिखना जरूरी है

पिता मेरे मुकम्मल थे हर इक अंदाज़ में लेकिन
तो थोड़ा इल्म उनका भी मुझे मिलना जरूरी है

इस संकलन में सोनरूपा की लिखी सौ के करीब ग़ज़लें और नज़्मे हैं जिनमें एक चौथाई हिस्सा नज़्मों का है। उनकी भाषा में एक सहजता है। पर इसी सहजता से अपने अशआरों में वो जगह जगह मानवीय भावनाओं का आकलन करती चलती हैं। मिसाल के तौर पर छोटी बहर के इन अशआरों पर गौर फ़रमाएँ

जो हर पल हँसते रहते हैं
उनके दिल सुनसान समझिए

रोज चुभेंगे काँटे दिल में
फूलों से नुकसान समझिए

और उनकी इस सोच को आप या मैं शायद ही कोई नकार सके। ज़िदगी के ये अनुभव यूँ तो हम सबने जिये हैं पर जब वो इन शेरों की शक़्ल ले कर हमसे टकराते हैं तो उनका असर कुछ और होता है।

परेशाँ जब भी होते हैं. ख़ुदा के पास आते हैं
नहीं तो एक मूरत है ये कह के भूल जाते हैं

किसी सूरत भी अपना हाले दिल उनसे नहीं कहना
ये रो रोकर जो सुनते हैं, वही हँस हँस उड़ाते हैं

और उनके ये शेर तो खास दाद का हक़दार है

कई अंदाज़ रखते हैं कई किरदार जीते हैं
यही आदत उन्हें ख़ुद से मिलने नहीं देती


हम कुछ भी लिखते हैं तो उसे लिखते समय मन में कोई ना कोई रहता ही है पर फिर सारी चतुराई इस बात पर भी रहती है कि अपनी अभिव्यक्ति के चारों ओर शब्दों का वो जाल बुने कि अगला समझते हुए भी असमंजस में रहे। तब भी लिखने वाले की वही उम्मीद रहती है जो सोनरूपा की है..

मेरे अशआर तुम समझ लेना
अपना किरदार तुम समझ लेना

जिसने सोचा न हो नफ़ा नुकसान
वो खरीदार तुम समझ लेना

सोनरूपा की लेखनी में कहीं दार्शनिकता का पुट है

ये बच्चे ये मकाँ, ये मालो दौलत सब है मुट्ठी में
मगर मिट्टी ही आख़िर में मेरा तेरा ठिकाना है

जिनको दर सस्ती लगे एहसास की
उनकी कीमत भी गिरानी चाहिए
इक कलंदर ने हमें समझा दिया
ज़िंदगी कैसे बितानी चाहिए

सच्चाई तो कछुए जैसी चलती है
झूठे किस्से पानी जैसे बहते हैं

तो कहीं रूमानियत से भरे एहसास भी

हमसफ़र हमनवाँ सा लगता है
चाँद अब आशना सा लगता है
देखने में तो कोरा काग़ज़ है
और सब कुछ लिखा सा लगता हैउनकी एक ग़ज़ल तो बेज़ान सी लगने वाली खिड़कियों को समर्पित है। प्रेम, प्रतीक्षा, हिंसा और बाहरी दुनिया से एक सेतु के रूप में देखा है उन्होंने इन खिड़कियों को अपनी ग़ज़ल में। अपनी बात करूँ तो इन झरोखों की वज़ह से मेरे दिल के रोशनदान को कई बार उम्मीदों की धूप सेंकने का अवसर मिला है इस लिए ये शेर मुझे बेहद अपना सा लगता है जब लेखिका कहती हैं

गुनगुनाती मुस्कुराती खिड़कियाँ
इश्क़ का जादू जगाती खिड़कियाँ

और अगला शेर पढ़ते हुए दंगों के बीच अपने शहर का वो दिन याद आ जाता है

हर तरफ़ सड़कों पर वो कोहराम है
डर से जिसके सहम जाती खिड़कियाँ

ये तो हुई ग़ज़लों की बातें। इस किताब में सोनरूपा की दो दर्जन नज़्में भी शामिल हैं। अगर ईमानदारी से कहूँ तो उनकी लिखी नज़्मों में मुझे उनकी ग़ज़लों से ज्यादा प्रभावित किया। नज़्मों में लेखिका के व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। इन नज़्मों में वो अपने उन सभी रंगों में नज़र आती हैं जिसे उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों पर जिया है। कुछ नज़्मों का खास जिक्र करना चाहूँगा। अपनी माँ के प्रति कृतज्ञता को वो प्यारे अंदाज़ में यूँ व्यक्त करती हैं।बुहार देती हो तुम
हर दर्द मेरा
बिखरती हूँ मैं
जब भी
तुम्हारे आगे
पत्ते की तरह !

उनकी नज़्म 'आसानियाँ भी दुश्वारियाँ हैं..' में भौतिक सुख सुविधाओं के बीच पली बढ़ी एक स्त्री के मन का कचोट सामने आता है। ये प्रश्न लेखिका को सालता है कि जीवन के कष्टों को बिना ख़ुद झेले हुए क्या कोई उस वर्ग का दुख समझ सकता है। एक छोटी बच्ची के साथ हुए बलात्कार पर व्यथित हृदय से लिखी उनकी नज़्म 'तुम ....' मन को झकझोर जाती है। वहीं दूसरी तरफ़ 'अल्हड़ लड़की का चाँद' में चाँद के साथ किशोरी की गुफ्तगू को पढ़कर मन ठेठ रूमानियत के धागों में बँधा चला जाता है। आपको यकीन नहीं होता तो आप ख़ुद ही लेखिका की आवाज़ में इसे सुन कर देखिए....

खुल गई अंबर की गाँठ
छिटके तारे और
बादलों के नाजुक से फाहों के बीच से
उतरे तुम
रात के चमकीले शामियानों के सजीले चितचोर
रात की झिलमिल झील की पतवार
दुनिया भर की प्रेम कथाओं के कोहीनूर..ओ चाँद....


http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.in/2014/04/likhna-zaroori-hai.html



मंगलवार, जुलाई 15, 2014

किरणें


न्यूज़ चैनल्स की क्लिपिंग्स से मालूम चलता है कि गाज़ियाबाद के एक फाइव स्टार होटल की ओपनिंग सेरेमनी में होटल मालिक किसी नामी गिरामी राजनेता ,फिल्म स्टार या किसी और बड़ी हस्ती को न बुलाकर किसी अनाथालय के ख़ूब सारे बच्चों को चीफ़ गेस्ट बनाते हैं जहाँ बच्चे महँगी घास से ग्रीन हुए लॉन में मन भर कर उछल कूद करते हैं और पेट भर कर नाज़ुक क्राकरी में खाते हैं
तब
जब चेन्नई में गंभीर रूप से बीमार एक २१ साल की युवती के जल्दी से जल्दी हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए पुलिस और चेन्नई के नागरिक ट्रेफिक को एक जगह जाम कर देते है जिससे उसका ट्रीट मेंट समय पर संभव हो पाता है
तब
जब एक आई टी कम्पनी में काम करने वाला युवक अपनी पहली तनख्वाह से रोड पर लावारिस घूमने वाले बच्चों को मन भर कर मेक्डोनाल्ड में पिज़्ज़ा बर्गर खिलाता है 
 तब
जब एक रईस बिज़नेसमैन सुबह-सुबह गुरूद्वारे जाकर वहाँ आने वाले लोगों के जूते साफ़ करता है और मन में  संतोष का एहसास लेकर अपनी आलीशान कार में बैठ कर ऑफिस का रुख़ करता है और ये वीडियो सोशल साइट्स पर लाखों लोग देखते हैं और लाखों बार ‘हैट्स ऑफ’ लिख कर उसे शेयर करते हैं
तब
जब मेरे पास एक इंजीनियरिंग के छात्र का फ़ोन आता है और वो मुझसे कहता है ‘मैडम आई हव गौट युअर नंबर फ्रॉम अ ब्लड सेंटर ..हम पढाई करने के बाद बचा हुआ समय एक कैंसर हॉस्पिटल को देते हैं जहाँ हम ग़रीब कैंसर  पेशेंट्स के इलाज के लिए फंड्स इकठ्ठा करते हैं ,कैन यू हेल्प अस ,हम आपको अपने बारे में डिटेल एक मेल के थ्रू भेज रहे हैं जब आप निश्चिंत हो जाएँ तब हमारी मदद करें ,और वाक़ई में मेल देख कर उनका निस्वार्थ सेवाभाव मन को छू जाता है  
तब
आज के वक़्त,आज के दौर,आज के लोग,आज की पीढ़ी को संवेदनहीन कहना,लिखना और मानना वास्तव में जजमेंटल होना लगता है ये भी एक ज्यादती है जो अक्सर हम कर जाते हैं !