बुधवार, जुलाई 23, 2014

समीक्षा'लिखना ज़रूरी है'



प्रसिद्ध  ब्लॉगर मनीष कुमार जी ने मेरे ग़ज़ल संग्रह'लिखना ज़रूरी है' की विस्तृत समीक्षा की है

 अपने आप को व्यक्त करने की इच्छा हम सबमें से बहुतों की होती है। कभी जब ये कसक ज़रा ज्यादा जोर मारती है तो हम काग़ज़ के पन्नों को रंगते हैं और फिर भूल जाते हैं। पहले तो अपना लिखा देखकर ये लगता है भला इसे पढ़ेगा कौन? फिर ये भी लगता है कि अगर किसी ने पढ़ लिया और एक सिरे से ख़ारिज़ कर दिया तो फिर इस तरह नकारे जाने का दर्द ना जाने कब तक मन को टीसता रहेगा। कुछ दिनों पहले  कैफ़ी आज़मी से जुड़ा संस्मरण बाँटते समय बताया था कि ये झिझक और बढ़ जाती है जब अपने ही घर में लिखने पढ़ने वाले इतना नाम कमा गए हों कि उनके सामने अपनी हर कृति बौनी लगे। इसी संकोच की वज़ह से बहुतेरे अपने को कम आँकते हुए उसे सबके सामने लाने की ज़हमत नहीं करते और कुछ क़ैफी जैसे होते हैं तो हर उस मौके, उस दबाव को ध्यान में रखते हुए अपने हुनर का इम्तिहान देने से ज़रा भी नहीं कतराते।

सोनरूपा विशाल के पहले ग़ज़लों और नज़्मों का संग्रह 'लिखना ज़रूरी है' को भी इसी परिपेक्ष्य में देखना जरूरी है। लेखिका की पहचान एक ख्याति प्राप्त गीतकार कवि उर्मिलेश की सुपुत्री और एक ग़ज़ल गायिका की रही है। लेखिका भी इस पुस्तक को पाठकों के सम्मुख रखने से पहले उन्हीं मनोभावनाओं से गुजरी हैं जिसका मैंने ऊपर जिक्र किया है इसीलिए पुस्तक की प्रस्तावना में उनकी ये झिझक साफ दिखाई देती है जब वो लिखती हैं..
मैं वाकई इतनी काबिलियत नहीं रखती कि ग़ज़ल और ग़ज़लकारों की विराट परंपरा की फेरहिस्त में अपनी छोटी सी लेखन यात्रा से ख़ुद को एक संग्रह के माध्यम से खड़ा कर सकूँ। बस इतना मान लीजिए कि ये ग़ज़लें मेरी एहसास की शिद्दत हैं, मेरे रंग, कुछ देखे समझे तमाशे, धुँध में से रौशनी देखने की हसरत, निजत्व की तलाश, आसपास का परिवेश, विसंगतियाँ, जज़्बात, शिकन, हरारतें हैं।
ये भी है कि जो अपने अंदर की आवाज़ को समझ पाते हैं उनकी लेखनी पर ज्यादा विराम नहीं लग सकता। सोनरूपा ने अपनी इस फ़ितरत को समझा और इसीलिए वो लिखती हैं

मेरे जज़्बात को स्याही का रंग मिलना जरूरी है
मुझे रहना हो गर ज़िंदा तो फिर लिखना जरूरी है

पिता मेरे मुकम्मल थे हर इक अंदाज़ में लेकिन
तो थोड़ा इल्म उनका भी मुझे मिलना जरूरी है

इस संकलन में सोनरूपा की लिखी सौ के करीब ग़ज़लें और नज़्मे हैं जिनमें एक चौथाई हिस्सा नज़्मों का है। उनकी भाषा में एक सहजता है। पर इसी सहजता से अपने अशआरों में वो जगह जगह मानवीय भावनाओं का आकलन करती चलती हैं। मिसाल के तौर पर छोटी बहर के इन अशआरों पर गौर फ़रमाएँ

जो हर पल हँसते रहते हैं
उनके दिल सुनसान समझिए

रोज चुभेंगे काँटे दिल में
फूलों से नुकसान समझिए

और उनकी इस सोच को आप या मैं शायद ही कोई नकार सके। ज़िदगी के ये अनुभव यूँ तो हम सबने जिये हैं पर जब वो इन शेरों की शक़्ल ले कर हमसे टकराते हैं तो उनका असर कुछ और होता है।

परेशाँ जब भी होते हैं. ख़ुदा के पास आते हैं
नहीं तो एक मूरत है ये कह के भूल जाते हैं

किसी सूरत भी अपना हाले दिल उनसे नहीं कहना
ये रो रोकर जो सुनते हैं, वही हँस हँस उड़ाते हैं

और उनके ये शेर तो खास दाद का हक़दार है

कई अंदाज़ रखते हैं कई किरदार जीते हैं
यही आदत उन्हें ख़ुद से मिलने नहीं देती


हम कुछ भी लिखते हैं तो उसे लिखते समय मन में कोई ना कोई रहता ही है पर फिर सारी चतुराई इस बात पर भी रहती है कि अपनी अभिव्यक्ति के चारों ओर शब्दों का वो जाल बुने कि अगला समझते हुए भी असमंजस में रहे। तब भी लिखने वाले की वही उम्मीद रहती है जो सोनरूपा की है..

मेरे अशआर तुम समझ लेना
अपना किरदार तुम समझ लेना

जिसने सोचा न हो नफ़ा नुकसान
वो खरीदार तुम समझ लेना

सोनरूपा की लेखनी में कहीं दार्शनिकता का पुट है

ये बच्चे ये मकाँ, ये मालो दौलत सब है मुट्ठी में
मगर मिट्टी ही आख़िर में मेरा तेरा ठिकाना है

जिनको दर सस्ती लगे एहसास की
उनकी कीमत भी गिरानी चाहिए
इक कलंदर ने हमें समझा दिया
ज़िंदगी कैसे बितानी चाहिए

सच्चाई तो कछुए जैसी चलती है
झूठे किस्से पानी जैसे बहते हैं

तो कहीं रूमानियत से भरे एहसास भी

हमसफ़र हमनवाँ सा लगता है
चाँद अब आशना सा लगता है
देखने में तो कोरा काग़ज़ है
और सब कुछ लिखा सा लगता हैउनकी एक ग़ज़ल तो बेज़ान सी लगने वाली खिड़कियों को समर्पित है। प्रेम, प्रतीक्षा, हिंसा और बाहरी दुनिया से एक सेतु के रूप में देखा है उन्होंने इन खिड़कियों को अपनी ग़ज़ल में। अपनी बात करूँ तो इन झरोखों की वज़ह से मेरे दिल के रोशनदान को कई बार उम्मीदों की धूप सेंकने का अवसर मिला है इस लिए ये शेर मुझे बेहद अपना सा लगता है जब लेखिका कहती हैं

गुनगुनाती मुस्कुराती खिड़कियाँ
इश्क़ का जादू जगाती खिड़कियाँ

और अगला शेर पढ़ते हुए दंगों के बीच अपने शहर का वो दिन याद आ जाता है

हर तरफ़ सड़कों पर वो कोहराम है
डर से जिसके सहम जाती खिड़कियाँ

ये तो हुई ग़ज़लों की बातें। इस किताब में सोनरूपा की दो दर्जन नज़्में भी शामिल हैं। अगर ईमानदारी से कहूँ तो उनकी लिखी नज़्मों में मुझे उनकी ग़ज़लों से ज्यादा प्रभावित किया। नज़्मों में लेखिका के व्यक्तित्व के दर्शन होते हैं। इन नज़्मों में वो अपने उन सभी रंगों में नज़र आती हैं जिसे उन्होंने अपने जीवन के विभिन्न पड़ावों पर जिया है। कुछ नज़्मों का खास जिक्र करना चाहूँगा। अपनी माँ के प्रति कृतज्ञता को वो प्यारे अंदाज़ में यूँ व्यक्त करती हैं।बुहार देती हो तुम
हर दर्द मेरा
बिखरती हूँ मैं
जब भी
तुम्हारे आगे
पत्ते की तरह !

उनकी नज़्म 'आसानियाँ भी दुश्वारियाँ हैं..' में भौतिक सुख सुविधाओं के बीच पली बढ़ी एक स्त्री के मन का कचोट सामने आता है। ये प्रश्न लेखिका को सालता है कि जीवन के कष्टों को बिना ख़ुद झेले हुए क्या कोई उस वर्ग का दुख समझ सकता है। एक छोटी बच्ची के साथ हुए बलात्कार पर व्यथित हृदय से लिखी उनकी नज़्म 'तुम ....' मन को झकझोर जाती है। वहीं दूसरी तरफ़ 'अल्हड़ लड़की का चाँद' में चाँद के साथ किशोरी की गुफ्तगू को पढ़कर मन ठेठ रूमानियत के धागों में बँधा चला जाता है। आपको यकीन नहीं होता तो आप ख़ुद ही लेखिका की आवाज़ में इसे सुन कर देखिए....

खुल गई अंबर की गाँठ
छिटके तारे और
बादलों के नाजुक से फाहों के बीच से
उतरे तुम
रात के चमकीले शामियानों के सजीले चितचोर
रात की झिलमिल झील की पतवार
दुनिया भर की प्रेम कथाओं के कोहीनूर..ओ चाँद....


http://ek-shaam-mere-naam.blogspot.in/2014/04/likhna-zaroori-hai.html



1 टिप्पणी:

  1. समीक्षा से लगता है संग्रह पढ़ने लायक होगा. आपको बहुत बधाई.. हिम्मत दिखाने के लिए. प्रकाशक का नाम पता बताने का कष्ट करें .

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