बुधवार, अक्तूबर 29, 2014

फीलिंग नॉस्टॅल्जिक

'फीलिंग नॉस्टॅल्जिक फेसबुक पर कुछ दोस्त अपने स्टेटस में अक्सर इसे जोड़ कर अपनी यादें पोस्ट करते  है | मुझे दोस्तों की ये यादें,बातें सबसे बहुत सहज और अच्छी लगती हैं | 'नॉस्टेलजिया ' यानि ‘बीते वक़्त की याद’ |

स्मरणहीन के अलावा कोई ऐसा नहीं है जो यादें दोहराता न हो,हम अक्सर भूले बिसरे पल दोहराते हैं |फ़िर आज ऐसी कौन सी नई बात मैं लिखने बैठी हूँ यादों के बारे में ? ये मैंने ख़ुद से पूछा | शायद इसीलिए कि मुझे महसूस होता है कि जो हमारा आज है इसे याद करने वाले ज़रूर  होंगे लेकिन ये यादें इतनी पक्की या पुर सुकून न हों जितनी अब हैं या पहले थीं | 

मल्टीटास्किंग लोगों की बढ़ती गिनती ,सिर्फ़ ‘मैं और मेरा’ सर्वनाम जानने वाले लोग,ए फॉर एप्पल से पहले एस फॉर सक्सेस के सिखलाने वाले माँ पिता ,ग से ग्लोबलाइजेशन के आगे अपने ग से गाँव अपनी जड़ों को भूल जाने वाले लोग सिर्फ़ हासिल करने की कोशिश में  हैं पा लेने की नहीं | वो ये सब कर पाते हैं तो सिर्फ़ अपने हसरत और मंज़िल पर नज़र रखने के बाद ,कई यादें कई तहों में दबा लेने के बाद | क्यों कि आगे की रौशनी इन रोशनियों को मद्धम कर देने के बाद या एक याद बना देने के बाद ही ज़्यादा मालूम होती है | आगे बढ़ने के लिए ऐसा होना ज़रूरी भी है और नया तो पुराना होता ही है |

लेकिन न जाने क्यों, इस वक़्त में ऐसा लगता है कि वास्तव में हमें अपने पुराने को याद किये जाने की ज़्यादा ज़रुरत है | मशीनी दिनों के बाद कुछ बीती हुई लेकिन जिंदा यादों का दोहरना जब संजीवनी लगने लगे तो वाक़ई लगता है कि हमारा आज बीते कल से बेहतर नहीं है  |शायद इसीलिए अपने आज को साधने के लिए पुरानी यादें शेयर करने वाले लोग और अपनी परम्पराओं को फैशन में ही सही लेकिन दोहराने वाले लोगों की संख्या मुझे बढ़ती हुई लग रही है बनिस्बत पहले के |

वो चीज़ें जो भुला दी गयीं थीं और लग रहा था कि अब शायद ये 'म्यूज़ियम' में सजा दी जाएँगी ,ऐसा होते होते रह गया , मैंने सी पी के कई रेस्तरां का इंटीरियर बदला देखा है ,विदेशी ज़ायके लेते हुए लोग यहाँ के बदले देसी अदाज़ को पसंद कर रहे हैं , चीनी से बनी सफ़ेद और ऊपर पीले रंग के ढक्कन से ढँकी आचार की वरनी जिसे दादी अचार की लम्बी ज़िन्दगी के लिए सर्वोत्तम मानती थीं उन्हें अब इन्हीं रेस्तरां में कुछ स्टायलिश ढंग से रखा हुआ देखा जा सकता है ,दिल्ली में जब होती हूँ तो पंडारा में अक्सर मैं एक शुद्ध शाकाहारी रेस्तरां में जाना पसंद है वहाँ भी इस बार नज़ारा कुछ बदला बदला था ,वहाँ काँच की नाज़ुक क्रॉकरी की जगह स्टील की चकोर प्लेट्स और कटोरियों ने ले ली है | पक्के तौर पर इनके मालिकों ने  नॉस्टॅल्जिक शब्द की गहराईयों,उदासियों ,मुस्कुराहटों को ज़ेहन में बिलकुल न रखा हो लेकिन उनके यहाँ आने वाले लोगों का ज़ेहन ज़रूर इन पुरानी चीज़ों को देखकर किसी भी रूप में प्रतिक्रिया ज़रूर देता होगा |

इस वक़्त ऐसा लगता है जैसे सब के सब सिर्फ़ अपने लिए प्रतियोगिताएं आयोजित कर रहे हैं और अकेले ही पहले पायदान के लिए भाग रहे हैं और प्रेशर इतना रखते हैं कि इस रेस में उनके साथ न जाने कितने शामिल हों, ऐसे में किसे फ़ुर्सत है कि एक-एक पल को कीमती मान कर उसे भरपूर जिये और जो पल भरपूर नहीं जिया जाता वो भरपूर याद भी नहीं रहता | अगर यही रफ़्तार रही तो क्या वाक़ई हमारा आज जो हमारा कल होगा हमें उतना ही याद होगा जितना याद हमें बीता हुआ कल है ?शायद नहीं |

नॉस्टेलजिया ’ शब्द का अर्थ मालूम हो लेकिन उसे महसूस न कर पायें ,न  ही भागते भागते गुज़र रही ज़िन्दगी में बीते वक़्त को याद कर पायें इससे ज़्यादा ख़राब अपनी ख़र्च की गयी ज़िन्दगी का हिसाब क़िताब क्या होगा |

बहरहाल अब मैं कुछ ज़्यादा ही सोच रही हूँ ,अभी कुछ दिन पहले मैंने अपनी दादी की भतीजी यानि मेरी बुआ जी को फ़ोन मिलाया ,क्यों ? क्यों कि दादी एक कहानी सुनाती थीं जिसमे एक चुहिया की शादी गाँव के एक आदमी से हो जाती है वो चुहिया अपने पति से अपने ससुराल वालों की शिकायत की शुरुआत ‘तिक तिक’ कह कर और गाकर करती है ये सब दादी इतने मज़ेदार तरीके से सुनाती थीं कि हम उस कहानी को दिन कई कई बार सुनने की ज़िद करते थे ,बुआ जी ये कहानी बिलकुल उन्हीं की तरह सुनाती हैं ये कभी उनकी छोटी बहन ने मुझे बताया था |  तभी से मैं सोच रही थी कि उनसे ये कहानी सुनूँ और उसे रिकॉर्ड कर लूँ |कुछ ऐसी ही और कवायतें और भी जारी हैं |

शायद कुछ दिनों से मेरा भी स्टेटस ऑफ़ माइंड यही है ‘फ़ीलिंग  नॉस्टॅल्जिक' या शायद कुछ सहेज समेट लेने की ज़रुरत है या शायद उस वक़्त के बीत जाने का इस वक़्त अफ़सोस है |




शनिवार, अक्तूबर 18, 2014

मेरी आई बॉल्स पलकों में क़ैद हैं

तीन दिन बाद घर वापस आई हूँ ,आदतन इन दिनों आये अखबार खंगाले बिना मुझे चैन नहीं आता, ख़ास-ख़ास ख़बरें पढ़ रही हूँ और अब नींद भी आने लगी है |

स्पोंडिलाईटिस का दर्द पिछले कुछ दिनों से परेशान कर रहा है, और यूँ ही पढ़ते-पढ़ते अख़बार के दैनिक कॉलम पर मेरी नज़र गयी है पूरे कॉलम में बस यही बात को मैंने ढंग से  और दो बार पढ़ा है जहाँ डॉ.शिंडलर कहते हैं कि ‘डॉक्टर के पास जाने वालों में से ९९ प्रतिशत को कुछ नहीं हुआ होता है वे डॉक्टर के पास इसीलिए जाते हैं उन्हें अपनी भावनाओं को काबू करने की कला नहीं मालूम ,फिर उन्होंने ये भी बताया की बीमार घोषित किये गए लोगों में भी ज़्यादातर इसीलिए बीमार हैं क्योंकि उनके पास सकारात्मक विचार नहीं’ये पैरा को पढ़कर इसमें से मैंने अपने काम लायक सत निकाल लिया ,कि सोनरूपा तुम भी अपनी छोटी-छोटी तकलीफ़ों को नज़रंदाज़ करना सीखो |मैंने लाइट्स ऑफ कर दी हैं |लेकिन लेटते ही कई बातें नींद में ख़लल डाल रही हैं मेरे आई बॉल्स बंद पलकों में क़ैद हैं और आँखें खुलने का इंतज़ार कर रही हैं मुझे एक ही रास्ता सूझ रहा है कि बस लिख डालूँ,२ बज रहे हैं और मैं टाइप कर रही हूँ |

१५ तारीख़ को तिहाड़ जेल में एक कविसम्मेलन में जाना हुआ,वहाँ सिर्फ़ अपनी कविता सुनाते वक़्त ही शायद मैं अपने काव्यपाठ की ओर दिमाग लगा पाई बाक़ी जितनी देर मैं वहाँ रही सामने बैठे कैदियों के चेहरों पढ़ती रही ,मुझे लगा कि कुछ दुर्दान्त अपराधियों से अलग कुछ चेहरे सिर्फ़ एक पल की ग़लती से सज़ायाफ्ता हैं,कुछ चेहरे क़िस्मत के दगाबाज़ होने का दंश झेल रहे हैं ,और इस मन:स्तिथि को सही पढ़ लेने की मेरी कोशिश पर मुहर सी लगती दिखाई दी जब मैंने जेल में होने वाली प्रार्थना में उन चेहरों पर वही कहानियाँ गढ़ी हुई दिखाई दीं जो मेरा मन उनके लिए लिख रहा था|
मैं वापस घर आ गई थी लेकिन क्या सचमुच आ पाई थी ?

कभी-कभी एक पल ज़िन्दगी की सबसे बड़ी कहानी बन जाता है और कभी कभी एक कहानी को एक पल ख़त्म भी कर देता है |

इस वक़्त मुझे नींद न आने की वजह देर रात गीतकार संतोषानंद जी के बेटे-बहू का दर्दनाक अंत की ख़बर पढ़ लेना है|

अगर ज़िन्दगी ऊन के गोले की तरह उलझ जाये फिर सुलझा भी ली जाये इतना आसान कहाँ होता है,गीतकार संतोषानन्द जी के बेटे संकल्प और बहू नंदिनी के लिए सब कुछ इतना आसान नहीं रहा होगा , इसीलिए उन्होंने जान देकर इस पहेली को सुलझाना चाहा | एक कवि औरों से ज़्यादा संवेदनशील होता है और अगर वो औरों के दर्द पूरी शिद्दत के साथ लिख सकता है तो ज़ाहिर है अपना दर्द वो कभी नहीं भुला सकता ,ऐसे ही संतान के बिछोह से मिलने वाले दर्द के बाद एक बेहतरीन गीतकार संतोषानंद जी को ‘वक़्त का मरहम उनका ज़ख्म भरेगा’ जैसी तसल्ली देना सिर्फ़ रस्म अदायगी है और हमारा संतोष है |

इसी तरह एक मजदूर को कोटे दार से अनाज की बार-बार भीख माँगकर भी अनाज नहीं मिल पाया,बीवी बच्चों को भूख से कलपता कैसे देखता ? इसीलिए वो भी चल दिया संकल्प और नंदनी की राह पर| एक ये ख़बर और |

लेकिन ये जाने वाले लोग फिर एक प्रश्नपत्र हमारे हवाले कर गए , व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक खुली शिकायत दर्ज़ करवा गए |


ये भी सच है ऐसे पल ठहराव लाते हैं,इन पलों में कमरे की छत पर भी इबारत लिखी नज़र आ सकती है, लेकिन दुनिया से विरक्ति भी एक पल में होती है आसक्ति भी एक पल में|

..................................................................................................................कल रात |



सोमवार, अक्तूबर 13, 2014

ज़िन्दगी गोज़ ऑन

रघुपति सहाय 'फ़िराक'कहते हैं कि ‘वजूद में हमेशा बासी होने का ख़तरा रहता है’ और शायरी हमें बासी नहीं होने देती,वो हमें हमारी ज़िन्दगी वापस कर देती है’ |
सोचें तो अगर ज़िन्दगी अनिश्चित न होती तो हम कितने निश्चिंत होते और निश्चिंतता भी ज़िन्दगी को बासी कर देती है |

अब यहाँ शायरी और ज़िन्दगी दो अलग अलग बातें हैं,लेकिन समानांतर हैं क्यों कि न जाने कितनी ज़िंदगियाँ शायरी में जी ली जाती हैं |ज़िन्दगी का बयान ही तो होती हैं कवितायेँ ,शायरी|

पिछले कुछ दिनों से कुछ शाम छत पर टहलने का सबब हेल्थ के लिए अच्छा होने से इतर बादलों की आकृतियों को निहारना,अँधेरा होते ही कभी-कभी घर के सामने बगीचे में सिर्फ़ जुगुनुओं का झुरमुट देखने को मन होना ,रस्ते चलते बच्चे के सिर पर टीप मारकर उसे चौंक कर मुँह बनाते हुए देखना,दैनिक पूजा अर्चना से अलग बस कुछ देर कृष्ण के नाक नक्श को देखते रहना,कभी यूँ ही मन अपनी कोई पुरानी बनारसी साड़ी ठेठ देसी अंदाज़ में पहनने का बहाना ,पारदर्शी शीशे के वास में पनपे मनी प्लांट की बेल की जड़ इशारे करते हुए दिखाई देना और कहना मजबूत बनी रहना तभी ज़िन्दगी मेरे हरे पत्तों जैसी ख़ूबसूरत बनी रहेगी| 

ये सारी चाहतें क्या सही मायने में जी जाने वाली ज़िन्दगी से दूर जाने की वजह से हैं ?
अमीर कज़ल बाश का कहा हुआ याद आता है वो कहते हैं कि 
  
ज़िन्दगी तुझको मनाने निकले 
हम भी किस दर्जा दीवाने निकले 
 

इन अँधेरों में जियोगे कब तक 
कोई तो शम्मा जलाने निकले ....
लेकिन मेरे लिए ये छोटी छोटी चाहतें उस दर्ज़े के दीवाने पन तक पहुँचने से पहले ही संभल जाने की क़वायद हैं ?इतना लिखे जाने का अंत यही है ‘ज़िन्दगी सहज है इसे जटिल क्यों बनाया जाये’,ज़िन्दगी मुश्किल है तो ज़िन्दगी चैन भी है|   

ज़िन्दगी ने सहूलियतें दी हैं ये ख़ुशनसीबी है लेकिन सहूलियत का रस्ता भी बड़ा सीधा-सादा होता है और यहीं से  ज़िन्दगी में बासीपन का ख़तरा दिखाई देने लगता है |
जावेद साहब कहते हैं

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

तो बिलकुल सही फ़रमाते हैं
लेकिन उनके लिए ये बात सही जो इस बात से बावस्ता हैं और जिनके लिए सहूलियतों का रास्ता रोमांचक नहीं | 

रोज़ सोना रोज़ उठना ज़िन्दगी का ये दस्तूर निभा लेना कोई मुश्किल काम नहीं लेकिन सोने का बाद वाक़ई सोना और उठने के बाद वाक़ई उठना ज़िन्दगी के मैदान पर असल खेल है जो खेला जाना चाहिए और अगर ऐसी ज़िन्दगी के कुछ पल अपनी जायदाद बन जायें तो लगता है कि न जाने कितनी सदियों से अधूरी नींद को ठिकाना मिल जाये,आकाश में उगते सूरज से अलग एक सूरज हर सुबह पलकों में जग जाये |

हम जग जाएँ,संभल जायें,बह जायें |

मुझे किसी की चंद पंक्तियाँ याद आती हैं

बनी बनाई हुई राह चाहते हैं सब
बगैर काम के तनख्वाह हैं सब
समन्दरों में उतरने का दम किसी में नहीं
समन्दरों की मगर थाह चाहते हैं सब ये

ये ज़िन्दगी
लिखी जाती रहेगी लेकिन अधूरी रहेगी
ये पढ़ी जाती रहेगी लेकिन समझी न जाएगी
हम इससे नाराज़ भी होंगे इसके नाज़ भी उठायेंगे
पूर्णता के साथ ख़ालीपन आता है
और ख़ालीपन के साथ बासीपन
और बासीपन किसे भाता है तो फ़िर तो यही सच है कि
‘ज़िन्दगी गोज़ ऑन’ 
'ऐ ज़िन्दगी कीप मूविंग'.........................................................................सोनरूपा !!!


शुक्रवार, अक्तूबर 03, 2014