सोमवार, अक्तूबर 13, 2014

ज़िन्दगी गोज़ ऑन

रघुपति सहाय 'फ़िराक'कहते हैं कि ‘वजूद में हमेशा बासी होने का ख़तरा रहता है’ और शायरी हमें बासी नहीं होने देती,वो हमें हमारी ज़िन्दगी वापस कर देती है’ |
सोचें तो अगर ज़िन्दगी अनिश्चित न होती तो हम कितने निश्चिंत होते और निश्चिंतता भी ज़िन्दगी को बासी कर देती है |

अब यहाँ शायरी और ज़िन्दगी दो अलग अलग बातें हैं,लेकिन समानांतर हैं क्यों कि न जाने कितनी ज़िंदगियाँ शायरी में जी ली जाती हैं |ज़िन्दगी का बयान ही तो होती हैं कवितायेँ ,शायरी|

पिछले कुछ दिनों से कुछ शाम छत पर टहलने का सबब हेल्थ के लिए अच्छा होने से इतर बादलों की आकृतियों को निहारना,अँधेरा होते ही कभी-कभी घर के सामने बगीचे में सिर्फ़ जुगुनुओं का झुरमुट देखने को मन होना ,रस्ते चलते बच्चे के सिर पर टीप मारकर उसे चौंक कर मुँह बनाते हुए देखना,दैनिक पूजा अर्चना से अलग बस कुछ देर कृष्ण के नाक नक्श को देखते रहना,कभी यूँ ही मन अपनी कोई पुरानी बनारसी साड़ी ठेठ देसी अंदाज़ में पहनने का बहाना ,पारदर्शी शीशे के वास में पनपे मनी प्लांट की बेल की जड़ इशारे करते हुए दिखाई देना और कहना मजबूत बनी रहना तभी ज़िन्दगी मेरे हरे पत्तों जैसी ख़ूबसूरत बनी रहेगी| 

ये सारी चाहतें क्या सही मायने में जी जाने वाली ज़िन्दगी से दूर जाने की वजह से हैं ?
अमीर कज़ल बाश का कहा हुआ याद आता है वो कहते हैं कि 
  
ज़िन्दगी तुझको मनाने निकले 
हम भी किस दर्जा दीवाने निकले 
 

इन अँधेरों में जियोगे कब तक 
कोई तो शम्मा जलाने निकले ....
लेकिन मेरे लिए ये छोटी छोटी चाहतें उस दर्ज़े के दीवाने पन तक पहुँचने से पहले ही संभल जाने की क़वायद हैं ?इतना लिखे जाने का अंत यही है ‘ज़िन्दगी सहज है इसे जटिल क्यों बनाया जाये’,ज़िन्दगी मुश्किल है तो ज़िन्दगी चैन भी है|   

ज़िन्दगी ने सहूलियतें दी हैं ये ख़ुशनसीबी है लेकिन सहूलियत का रस्ता भी बड़ा सीधा-सादा होता है और यहीं से  ज़िन्दगी में बासीपन का ख़तरा दिखाई देने लगता है |
जावेद साहब कहते हैं

जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

तो बिलकुल सही फ़रमाते हैं
लेकिन उनके लिए ये बात सही जो इस बात से बावस्ता हैं और जिनके लिए सहूलियतों का रास्ता रोमांचक नहीं | 

रोज़ सोना रोज़ उठना ज़िन्दगी का ये दस्तूर निभा लेना कोई मुश्किल काम नहीं लेकिन सोने का बाद वाक़ई सोना और उठने के बाद वाक़ई उठना ज़िन्दगी के मैदान पर असल खेल है जो खेला जाना चाहिए और अगर ऐसी ज़िन्दगी के कुछ पल अपनी जायदाद बन जायें तो लगता है कि न जाने कितनी सदियों से अधूरी नींद को ठिकाना मिल जाये,आकाश में उगते सूरज से अलग एक सूरज हर सुबह पलकों में जग जाये |

हम जग जाएँ,संभल जायें,बह जायें |

मुझे किसी की चंद पंक्तियाँ याद आती हैं

बनी बनाई हुई राह चाहते हैं सब
बगैर काम के तनख्वाह हैं सब
समन्दरों में उतरने का दम किसी में नहीं
समन्दरों की मगर थाह चाहते हैं सब ये

ये ज़िन्दगी
लिखी जाती रहेगी लेकिन अधूरी रहेगी
ये पढ़ी जाती रहेगी लेकिन समझी न जाएगी
हम इससे नाराज़ भी होंगे इसके नाज़ भी उठायेंगे
पूर्णता के साथ ख़ालीपन आता है
और ख़ालीपन के साथ बासीपन
और बासीपन किसे भाता है तो फ़िर तो यही सच है कि
‘ज़िन्दगी गोज़ ऑन’ 
'ऐ ज़िन्दगी कीप मूविंग'.........................................................................सोनरूपा !!!


1 टिप्पणी:

  1. अच्छा लिखतीं हैं आप, बड़ी फुर्सत से पढने वाला कॉफ़ी के एक कप के साथ। आपकी पुस्तक सांबर जी ने दिखाई थी अब ब्लॉग पर आकर भी अच्छा लगा

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