मंगलवार, जून 09, 2015

रिहाई

तनु नाम है उसका और उसकी माँ का नाम लता |जेल की महिला बैरक में जाने पर आज पहले की तरह उन्होंने मुझे सिर्फ़ अपनी ओर ध्यान देने के लिए ज़ोर नहीं दिया क्यों कि आज मेरे साथ पापा के नाम पर बनायी समिति के और भी मेम्बर्स थे |उन्होंने मुझे देखते ही बेहद ख़ुशी से हाथ हिलाया बस,फिर अपनी जगह जा कर बैठ गयीं|आज हम लोग महिला बैरक को एक टी वी उपहार के तौर पर देने गये थे |इससे पहले भी कुछ इसी तरह की वजहों से एक दो बार जेल आना हुआ  |

लगभग आठ साल पहले जब पहली बार मैं तनु और उसकी माँ से मिली तो उनका रवैया बहुत डरा देने वाला था |वो खा जाने वाली निगाह से हम सबको देख रही थीं | जो सामान हम लाये थे उन्हें एक दो  को छोड़ कर सभी महिला कैदियों ने मन से ले लिया था | तनु ने हमसे कहा कि हम कोई ऐसे वैसे नहीं हैं जो ये भीख लें |मैंने कहा' ये कोई भीख़ नहीं है ये तो हम आपसे मिलने आये तो बस थोड़ा कुछ.....उनके चेहरे के हाव भाव देख कर मैं चुप हो गयी| मैं महसूस कर पा रही थी कि उनके आत्म सम्मान को ठेस लगी है |वो ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहीं थीं ‘हम बेगुनाह हैं’ आँखों से जैसे आँसुओं की जगह गुस्सा बह रहा था |मेरा हाथ उन्होंने कस के पकड़ लिया था और कई पन्नों में लिखा कुछ मेरी ओर किया और बोलीं ‘इसे पढ़िए इसमें सब सच लिखा है’ |मैं बहुत डर सी गयी थी |लेडी कांस्टेबल ने मुझे उनसे अलग करवाया ,और भी महिला कैदियों के चेहरे उनकी कहानियाँ कह देने को आतुर दिखे लेकिन ख़ामोशी से | उन सब में सब से ज़्यादा मुखर वही दोनों थी | बाहर आकर मैंने जेलर से उनके बारे में जब पूछा तब उन्होंने बताया कि ये लड़की ऑफिसर पोस्ट पर थी और एक अच्छे परिवार से ताल्लुक रखती है |लेकिन ये दोनों माँ-बेटी यहाँ जेल में दहेज़ एक्ट में निरुद्ध हैं क्यों कि मरते समय इसकी भाभी ने इनके ख़िलाफ़ बयान दिया था |झूठा या सच्चा कहने से वो बचे लेकिन मैं समझ गयी थी ये एक और झूठे दहेज़ केस का मामला है||दुःख होता है कि दहेज़ एक्ट एक सही उद्देश्य से बनाया गया था उसका भी ग़लत इस्तेमाल लोग कर रहे हैं |खैर मुझे पूरी तरह सच्चाई मालूम भी नहीं थी |उन्होंने ये भी बताया कि ये लड़की बहुत अच्छी कवितायेँ लिखती है और वो जल्द ही इसकी कवितायेँ प्रकाशित करवाने वाले हैं, सुनकर मुझे अच्छा लगा |

अगर सजा बेगुनाह को मिले तो उसके दुःख का अंदाज़ा हम लगा ही सकते हैं | मैं वापस घर आ गयी थी लेकिन मन वहीँ था |

फिर एक दो बार जाना हुआ और फिर से ऐसा ही घटनाक्रम |

जाते-जाते उसकी माँ ने भी अपना रजिस्टर मुझे थमा दिया ये कहते हुएअभी पिछले साल मेरा उनसे फिर मिलना हुआ |हर बार नए नए बंदी मिलते लेकिन ये दोनों हमेशा की तरह रिहाई के इंतज़ार करती हुई मिलतीं |इस बार मुझे इनके साथ ज़्यादा वक़्त मिला या यूँ कहिये इन्होनें मुझे जाने ही नहीं दिया |इनकी बातें सुनते सुनते अब मेरे भी आँसू इनके आँसुओं के साथ बहने लगे थे जिन्हें मैंने मुश्किल से रोका | थोड़ी ही देर में सब ठीक सा लगने लगा था जब कांस्टेबल ने कहा ‘मैडम आप जो गेम लाई हैं न,उसे ये दोनों सब बच्चों को सिखा देंगी,बहुत होशियार हैं दोनों’ ‘हाँ हाँ...क्यों नहीं ,हम इसे सेट करके सिखा देंगे बच्चों को’ दोनों ने कहा |(जेल में महिला बंदियों के साथ उनके अबोध और निर्दोष बच्चे अपनी क़िस्मत में बदी सज़ा काट रहे हैं )अख़बारों के ज़रिये ये मेरे बारे में काफ़ी कुछ अपडेट रहती थीं |हर बार मुझे उनकी ओर से बधाइयाँ मिलतीं और आशीर्वाद भी |इस बार तनु ने  मुझे ये कहते हुए अपनी क़िताब दी थी ‘सोनरूपा जी आप हमारा दर्द समझती हैं,मुझे अपनी क़िताब की कुछ ही कॉपियाँ मिल पायीं हैं | जिन्हें भी मैंने दी उन्होंने मुझे लौटाई ही नहीं ,न ही दो शब्द उस क़िताब के लिए कहे लेकिन मुझे उम्मीद है कि मेरे पास बची एकमात्र कविताओं की क़िताब को आप पढ़ेंगी और ज़रूर उसके बारे में कुछ लिखेंगी’ | मैंने उन्हें भरोसा दिलाया और वो क़िताब अपने साथ ले आई | जाते जाते उसकी माँ ने भी मुझे अपना रजिस्टर ये कहते हुए थमा दिया था किये कवितायेँ मेरे दर्द की दास्तान हैं ये रजिस्टर मेरे लिए बहुत क़ीमती है, इसे भी पढियेगा |मैं जानती थी कि अपने एहसासों को शब्दों में पिरो देने के बाद वो शब्द नहीं धड़कन बन जाते हैं | मैंने घर आते ही उस क़िताब और रजिस्टर की ज़ेरोक्स निकलवा कर उन दोनों संभाल कर रख लिया था |जैसे जैसे मैं कवितायेँ पढ़ती जा रही थी वैसे वैसे मैं ..................................!

आज फिर मिलने पर उसने बस इतना ही कहा ‘सोनरूपा जी आपने जो नोट उस संग्रह पर लिखा उसे उन्होंने बहुत संभाल कर रखा है ,मेरे लिए आज तक इतना अच्छा कभी किसी ने नहीं लिखा और ये कहते हुए वो फफ़क पड़ी’|मुझे मालूम था मैंने उस नोट में उसकी कविताओं में व्यक्त उसके दर्द को साझा किया था बस यही उसके लिए महत्वपूर्ण था | उसके साथ ही क्यों ये हम सबके साथ भी ज़िन्दगी में अक्सर होता है कि हमारे दुःख का साझीदार हमारे सुख के साझीदार से कहीं ज़्यादा अहम् हो जाता है |
वो  नोट और उस संग्रह की कुछ कवितायेँ मैं आप सब के साथ भी शेयर करना चाहूँगी 

सितम’ को पढ़ने के बाद _____________________________________

ऐसा पहली बार हो रहा है मेरे साथ कि लिखते-लिखते मेरी कलम की स्याही में अचानक ही स्याही नहीं पानी सा छलकने लगता है | ये पानी नहीं हैं ये आँसू हैं जो ‘सितम’ की कविताओं से गुज़रते हुए बार-बार मेरी आँखों में डबडबाने लगते हैं !

अगर दर्द की परिभाषा को जाननी हो तो सितम की कवितायें पढ़ना दर्द की नई परिभाषा को जानना होगा !

अगर साहस और अन्याय के खिलाफ़ शक्ति संचयन की लौ की तीव्रता नापनी हो तो इन कविताओं की आग महसूस कर कुछ पल के लिए आप भी अपने शरीर में चिंगारियों को चुभता महसूस करेंगे !

इतने कठिन जीवन के बावजूद भी मानवीय एवं सामाजिक मूल्यों के प्रति विश्वास देखना हो तो ‘सितम’ की कविताओं के अर्थ टटोलने होंगे |

और आस के ख़ूबसूरत पलों की मधुरता को महसूसना हो तो फिर आपको ‘सितम’ की कवितायें को पढ़ते-पढ़ते एक सलोना सा ख़्वाब देखना होगा लेकिन फ़िर जाग कर उसे तोड़ना भी होगा |

सच ...क़िस्मत ने तनु को तूफ़ान में खड़ा कर दिया है |

बंद जगह जहाँ सिर्फ़ तूफ़ान है और तूफ़ान को झेलने वाला है |

ये तूफ़ान कमज़ोर क़ानून,स्वार्थ,भ्रष्टाचार,लालच,संवेदन हीनता,झूठ,फ़रेब की तेज़ हवाएं हैं |

अब ‘शाम’ होने के साथ उसे भी सोना ही है क्यों कि जागने का कोई सबब उसे नज़र नहीं आता,,उसके आस पास है ही क्या सिवाय चारदीवारी के |‘होलिका दहन’ के बाद रंगों से सरोवार होली में बिखरता लाल गुलाल उसे उसकी रोती हुई आँखों की लाली लगने लगा है|,उसका जन्मदिन अब निर्दोषों के उद्दार की प्रार्थना में बीत जाता है,| ‘हवा’ से न जाने कितने प्रश्न पूछती रहती है वो |क्यों कि हवा ही है जो उसके और उसके छूटे आँगन से उसका आभासी मेल कराती है,|पराधीनों और बेबस को जेल में  मुबारक़ स्वतंत्रता दिवस’ मनाना कठिन है , ये उसके सिवा और उसके जैसे निर्दोष बंदियों के अलावा कौन जानता होगा,|
जेल के लगाये गये मूक श्याम पट के दर्द का दर्द भी जो संभाले रहती है उसका दिल कितना दर्द से भरा होगा ?उसकी ज़िन्दगी में रानी के रूप में एक मात्र रौशनी है  जिससे मिलना,जिसके बारे में सोचना उसे कुछ देर के लिए फिर से अपनी माँ,भाई और भाई की छोटी सी बेटी यानि रानी के जीवन में हुए अन्याय के खिलाफ़ लड़ने का हौसला देता है |

यही है तनु यानि ‘सितम’ की कविताओं की लेखिका जिसने अपने अंदर का आन्दोलन कलम से लिखा है ,उन्हें कविताओं में ढाला है ,और शब्दों ने भी तनु  की संवेदनाओं का भरपूर साथ दिया है |कई कवितायेँ भावों की महीन कारीगरी लगती हैं |

ईश्वर से प्रार्थना है उन्हें रास्ते दिखायें जिनसे होकर वो अपनी मंज़िलों और ख़ुशियों को पा सकें|मैं यहाँ ईश्वर से सिर्फ़ उनके लिए रास्ता दिखाए जाने की प्रार्थना इसीलिए कर रही हूँ क्यों कि उन्हें पढ़कर और उनसे जेल में दो बार संक्षिप्त मुलाक़ात कर उनके ज़ज्बे और उनकी हिम्मत पर ख़ूब भरोसा है मुझे | दहेज़ क़ानून को अपनी ढाल बना कर फ़रेब के दुश्चक्र रचने वालों से अपनी जंग वो जल्द ही जीत जाएँ | 
कामनाएँ |

सोनरूपा 

                  जेल परिसर में लगाये गये अभिव्यक्ति पटल के स्वागत पर ... 

                                                                    संस्कारित सोच ...........
                                      जेल में बिना कारण कैद प्रत्येक मासूम बच्चे को समर्पित ....
 
वो क्यों हैं जेल में ?
        हवा को संबोधित करते हुए ...क्यों कि हवा ही है जो उसके घर आँगन से होकर उस तक पहुँचती है 
मुझे आज दोनों माँ बेटी के चेहरे पर शांति और स्वभाव में थोड़ी सी स्थिरता दिखाई दी जो आज से पहले मैंने नोटिस नहीं की थी | वो फिर हँसते हुए बोलीं ‘अब जेलर साहब ही बताएँगे कि हम कब जेल से बाहर आ रहे हैं’| मैंने दोनों को शुभकामनायें दीं |अब तक बैरक में टी .वी सेट हो चुका था | हमारा भी चलने का वक़्त हो गया था |बाहर आते-आते पता चल गया था कि ये दोनों अगले माह की पाँच तारीख़ को रिहा हो रही हैं,बहुत ख़ुश हुई मैं ये सुनकर,हालाँकि मेरे मन ने उन दोनों को उनकी कवितायें  पढ़ कर ही निर्दोष मान लिया था लेकिन अदालत का फ़ैसला अब आया था|हमारे देश में अक्सर गुनाहगार भी अदालत में सुनवाई होने से पहले ही अपने गुनाह की सज़ा काट लेते हैं,और बदकिस्मत बेगुनाह भी निर्दोष साबित होने तक |

इस बार मैं घर लौटते वक़्त परेशान नहीं थी जितना पहले जेल से लौटते वक़्त हुआ करती थी लेकिन मन ही मन ख़ुद से सवाल कर रही थी कि 'कि बेगुनाह क्या वाक़ई क़ैद से रिहा हो पाते हैं' ?

(तनु और लता नाम काल्पनिक हैं )






बुधवार, मार्च 04, 2015

सबकी होली शुभ-शुभ हो !

रंग है री'_______________सबकी होली शुभ-शुभ हो !
मौसम की उजली रंगत हो होली में
अंतहीन सुख की पंगत हो होली में
उत्सव का अस्तित्व बने सम्पूर्ण तभी
सबकी प्रेम भरी संगत हो होली में
____________________________ शुभकामनाएं !
वृन्दावन की गलियों जैसा आलम हो
हर पल सजनी के संग उसका प्रीतम हो
सब पर ही  हों रंग गुलाबी , लाल , हरे
हर मुखड़ा मुस्काता, मुक्त , मनोरम हो
____________________________शुभकामनायें!
पंछी के कलरव सा  मधुर  सवेरा हो
अम्बर ने धरती पर रूप बिखेरा हो
होली में हर चित्त का चित्र लगे जैसे
नेह की कूची से हर रंग उकेरा हो
___________________________शुभकामनायें  !
फूलों जैसे खिल-खिल जाएँ होली में
दिल से हर इक को अपनाएँ होली में
इन्द्रधनुष के रंग भरें पिचकारी में
ख़ुद रंगें सबको रंगवाएँ होली में
___________________________शुभकामनायें  !

सोमवार, जनवरी 26, 2015

बाँटना ही है तो थोड़े फूल बाँटिये

आप देश में फैली कुरीतियों पर बड़ी आसानी से वक्तव्य दे सकते हैं, क़ाग़ज़ भर सकते हैं।आपका बुद्धि जीवी होना ख़तरे में पड़ जायेगा यदि आप अपने अन्वेषी नज़रिये से अच्छाई में भी बुरे से बुरा न खोज पाये तो| 
भ्रष्टाचार,बेरोज़गारी,आतंकवा,ग़रीबी,अशिक्षा,नारी अस्मिता,शोषित वर्ग की अधिकारों के प्रति अज्ञानता,अलगाववाद न जाने कितने कोढ़ हैं भारत के शरीर पर जिन का होना पल-पल हमें शर्मिंदा करता है| लेकिन क्या हमारा विशाल गणत्रंत,भारतीय संस्कार,मूल्य,वैज्ञानिक प्रगति,ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक समृद्धता ,विविध धर्म, विविध ढंग,विविध संस्कृति,सैन्य सम्पदा,औद्योगिक क्षमता,आधुनिक प्रगति,अन्न सम्पदा,वैदिक खज़ाना हमारे लिए अपने देश पर गर्व करने के कारण नहीं हैं?

अगर सिर्फ़ हमेशा ही नकारात्मक पहलूओं को ही दोहराया जाता रहे तो आप कितने सकारात्मक क्षणों और उनसे मिलने वाले सुकून को खो रहे हैं इसका आप को शायद ही भान हो|लेकिन ज़रा उन सैनिकों से पूछिए जिनके लिए उनका देश ही उनके लिए सब कुछ है उनसे अपने देश के लिए उनकी भावना पूछिए और फ़िर उनका  गर्वोन्मत सीना देखिये ।ज़रा सोचिये वो भी आपके नकारात्मक रिमार्क्स का पुलिंदा खोल के बैठ जाएँ तो कहाँ से लायेंगे वो जोश,ज़ज़्बा,प्रेरणा जिसकी बदौलत वो सरहद पर हमारी रक्षा के लिए कटिबद्द हैं। कल परेड में शामिल जल,थल,नभ सेना में शामिल स्त्री सेनानियों से पूछिए वो बतायेंगी कि उनकी कोमलता उनके देश के लिए उनकी जीवटता है ,बच्चों से पूछिये अपने देश का मतलब तो वो बड़ी मासूमियत से अपनी तोतली भाषा में देश के लिए सिर्फ़ प्यार और अपनापन जाहिर करेंगे ।

कल गणत्रंत दिवस था लेकिन आप का प्रलाप ज़ारी था,अरे...आप भारत के लिए ही ख़ुश हो लेते वो तो निरपराध है |जिन शहीदों,राज नेताओं,स्वतंत्रता सेनानियों,संविधान निर्माताओं के अथक संघर्षों के कारण हमें ये उत्सव मनाने का मौक़ा मिला,ख़ुशी ख़ुशी मना लेते|

यूँ भी परेशां होने कई वजह बड़ी आसानी से मिल जाती हैं खुश होने की ढूंढनी पढ़ती हैं। कभी कभी नए विचार नई समझ कुछ भी शाश्वत,निश्चित,सार्वभौमिक नहीं रहने देती लेकिन ये भी ज़रूरी है कि हर होने को समकालीन द्रष्टि भी चाहिए |

आज संचार क्रांति के दौर में जीना कई मायनों में उपलब्धि है तो कई मायनों में असंख्यों विचारों,मान्यताओं,जानकारियों का जाल भी है|जब ज़्यादा विचार आप तक पहुँचने लगें तो कभी कभी विचार शून्यता की स्तिथि पैदा हो जाती है | ऐसा कल कुछ मेरे साथ हुआ | परसों ही सोच लिया था कि गणतंत्र दिवस को आज उसी अंदाज़ में मनाया जाये जिस अंदाज़ में बचपन में मनाया करते थे |लेकिन गणत्रंत दिवस पर बहुत सी नकारात्मक बातों,विचारों,फ़िज़ूल की चर्चाओं को सोशल साइट्स पर पढ़कर मन खिन्न हो गया |

कभी कभी लगता है बुद्धि के माध्यम से आदमी सिर्फ़ सच के पहले दरवाज़े तक पहुँच पाता है लेकिन सच्चाई को पा लेने के लिए ह्रदय का रास्ता चाहिए जो बड़ा सुकोमल है|

ऐसे ही कुछ अवसर,रिश्ते,पल,यादें,उत्सव दिल से महसूस किये जाने चाहिए |
हर वक़्त क्यों इतना प्रलाप,विषाद ?

हौसला दीजिये,हौसला रखिये,ख़ुद एक क़दम बढ़ाइए,निराकरण बाँटिये,निराकरण कीजिये, सच्चाई को आवाज़ दीजिये सच्चाई की आवाज़ बनिए |आपके प्रलाप के कारण तब तो कुछ दूर हों वरना यूँ ही लिखने,बोलने से चर्चाओं से आप अपने आस-पास मानसिक तनाव,उद्वेग,उत्तेजना बढ़ाने में हाथ बंटा रहे हैं |  



सोमवार, जनवरी 05, 2015

तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं !!



धूप ....प्लीज़ आज मत निकलना'अभी दो दिन पहले सुबह से हो रही बारिश के बीच हलकी चमकती धूप से मैंने चुपचाप ये गुज़ारिश की और यक़ीन जानिए धूप साहिबा मान भी गयीं और चल दी ठुमक के वापस आराम करने के लिए | कड़क सर्दियाँ दिन की चूड़ियों जैसी खनखन को रात के ख़ाली कंगन की तरह चुपचाप देती हैं|आज का ये दिन भी थमा हुआ सा बिताने का मन था इसीलिए धूप के मुड़ते ही मैंने बिस्तर की पनाह ली |

टी.वी से ज़रा कम यारी है मेरी, लेकिन आज लीक बदलने का दिन था मेरा |लेकिन इतनी ही देर में शिंजन तेज़ी से मेरे पास आये और निक चैनल पर आ रहे ‘मोटू पतलू’ के दर्शक का रूप अख्तियार कर लिया |’चिंगम से बचना मुश्किल ही नहीं इम्पॉसिबल है’,’ख़ाली पेट दिमाग की बत्ती नहीं जलती’ जैसे डायलॉग शिंजन अक्सर दोहराते हैं लेकिन आज मोटू पतलू के समोसे से उठती भाप और डायलॉग मुझे भी दिन भर हँसाते रहे |

चैनल बदलते-बदलते NDTV Good Time पर एक प्रिटी सी ब्राइड पर मेरी नज़र थम गयी ,शो चल रहा था ‘बैंड बाजा विद  सव्यसाची मुखर्जी’ और लगभग एक ४५ मिनट के इस प्रोग्राम में शादी की रस्म,तैयारियाँ,गहने,सव्यसाची की डिज़ायनर ज़री साड़ियों ने मेरे कमरे की समन्दर के रंग की दीवारों पर पीले,लाल,सुनहरे रंग छिड़क दिये थे|शायद आज मैं मन से उन पलों से रिलेट कर पा रही थी जो कहीं मेरे अंतस में छुपे हुए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे |

आज न व्हाट्सएप न फेसबुक न ट्विटर न कोई मैगज़ीन |आज कुछ नहीं पढ़ना कुछ नहीं जानना |सर्दियों में खाना भी बस खानापूर्ति नहीं हो सकता लेकिन फिर भी आज किचन मेरी राह तकता रहा |ब्रेकफास्ट के बाद जो कुछ भी खाया गया उसमें मेरी श्रम बिलकुल नहीं था |मेरे कमरे की खिड़की मेरे लॉन की ओर खुलती है और इन दिनों लॉन में फूल यूँ खिल रहे हैं जैसे रात में फ़लक पर सितारे चमका करते हैं | मेरा पूरा दिन इन्हें देखते हुए ऐसे बीत जाता है जैसे ये मेरे बच्चों की पहली-पहली मुस्कुराहटें हों |

शाम आ चुकी थी अदरख वाली चाय और मैरी गोल्ड के बिस्किट के साथ मैंने ‘ज़हनसीब’लगभग दो या तीन बार सुना और दिन को बाख़ुशी विदाई दी |

शाम से रात तक की सीढ़ियाँ मैं बहुत जल्दी चढ़ गयी |लेकिन देर रात पूरे दिन के सुकून ने मुझसे मेरी साइड टेबल पर पढ़ी डायरी उठाने को कहा | मैंने मुस्कुराते हुए डायरी उठाई और ख़ुद से कहा सोनरूपा वाक़ई तुम्हारा ‘लिखना ज़रूरी है’ और मैंने पलकें झपकते हुए ख़ुद से कहा हाँ मेरा ‘लिखना ज़रूरी है’ |

कभी आंधी पिक्चर में संजीव कुमार ने सुचित्रा सेन के लिए गुलज़ार के लफ़्ज़ों को गुनगुनाया था ‘तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं.........रात को रोक लो|

आज जब सूरज ने मेरी बात मान ली थी तो मैंने भी अपने लिए ये गाना गुनगुनाया ‘तुम जो कह दो तो आज सूरज भी  .......................सुबह को रोक लो |

और इसी ख़ुशफ़हमी के साथ एक ग़ज़ल डायरी में दर्ज हुई |

क्यों कि कई वाक़ये,हालात,बेचैनी आपके लिखने के सबब होते हैं और आप महसूसते हैं कि हाँ ‘लिखना ज़रूरी है’|


        

नदिया हूँ पर फिर भी रुकने का मन है
चलते चलते आज ठहरने का मन है

काग़ज़ के टुकड़ों पर हाँ और ना लिखकर
झूठी इक उम्मीद में बंधने का मन है



चूड़ी नहीं पहनने पर फिर आज मुझे 
दादी की फटकार से डरने का मन है


मन है सब अच्छा सोचूँ अच्छा देखूँ
एक दफ़ा फिर बचपन चुनने का मन है

हालातों की तपती धूप में देख तुझे
मेरा इक बदली में ढलने का मन है

जीवन की अलमारी के हर कोने में
उम्मीदों के सिक्के भरने का मन है

आओ न निंदिया आँखों की देहरी पर
मीठे मीठे ख़्वाब से मिलने का मन है