सोमवार, जनवरी 05, 2015

तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं !!



धूप ....प्लीज़ आज मत निकलना'अभी दो दिन पहले सुबह से हो रही बारिश के बीच हलकी चमकती धूप से मैंने चुपचाप ये गुज़ारिश की और यक़ीन जानिए धूप साहिबा मान भी गयीं और चल दी ठुमक के वापस आराम करने के लिए | कड़क सर्दियाँ दिन की चूड़ियों जैसी खनखन को रात के ख़ाली कंगन की तरह चुपचाप देती हैं|आज का ये दिन भी थमा हुआ सा बिताने का मन था इसीलिए धूप के मुड़ते ही मैंने बिस्तर की पनाह ली |

टी.वी से ज़रा कम यारी है मेरी, लेकिन आज लीक बदलने का दिन था मेरा |लेकिन इतनी ही देर में शिंजन तेज़ी से मेरे पास आये और निक चैनल पर आ रहे ‘मोटू पतलू’ के दर्शक का रूप अख्तियार कर लिया |’चिंगम से बचना मुश्किल ही नहीं इम्पॉसिबल है’,’ख़ाली पेट दिमाग की बत्ती नहीं जलती’ जैसे डायलॉग शिंजन अक्सर दोहराते हैं लेकिन आज मोटू पतलू के समोसे से उठती भाप और डायलॉग मुझे भी दिन भर हँसाते रहे |

चैनल बदलते-बदलते NDTV Good Time पर एक प्रिटी सी ब्राइड पर मेरी नज़र थम गयी ,शो चल रहा था ‘बैंड बाजा विद  सव्यसाची मुखर्जी’ और लगभग एक ४५ मिनट के इस प्रोग्राम में शादी की रस्म,तैयारियाँ,गहने,सव्यसाची की डिज़ायनर ज़री साड़ियों ने मेरे कमरे की समन्दर के रंग की दीवारों पर पीले,लाल,सुनहरे रंग छिड़क दिये थे|शायद आज मैं मन से उन पलों से रिलेट कर पा रही थी जो कहीं मेरे अंतस में छुपे हुए अपनी बारी का इंतज़ार कर रहे थे |

आज न व्हाट्सएप न फेसबुक न ट्विटर न कोई मैगज़ीन |आज कुछ नहीं पढ़ना कुछ नहीं जानना |सर्दियों में खाना भी बस खानापूर्ति नहीं हो सकता लेकिन फिर भी आज किचन मेरी राह तकता रहा |ब्रेकफास्ट के बाद जो कुछ भी खाया गया उसमें मेरी श्रम बिलकुल नहीं था |मेरे कमरे की खिड़की मेरे लॉन की ओर खुलती है और इन दिनों लॉन में फूल यूँ खिल रहे हैं जैसे रात में फ़लक पर सितारे चमका करते हैं | मेरा पूरा दिन इन्हें देखते हुए ऐसे बीत जाता है जैसे ये मेरे बच्चों की पहली-पहली मुस्कुराहटें हों |

शाम आ चुकी थी अदरख वाली चाय और मैरी गोल्ड के बिस्किट के साथ मैंने ‘ज़हनसीब’लगभग दो या तीन बार सुना और दिन को बाख़ुशी विदाई दी |

शाम से रात तक की सीढ़ियाँ मैं बहुत जल्दी चढ़ गयी |लेकिन देर रात पूरे दिन के सुकून ने मुझसे मेरी साइड टेबल पर पढ़ी डायरी उठाने को कहा | मैंने मुस्कुराते हुए डायरी उठाई और ख़ुद से कहा सोनरूपा वाक़ई तुम्हारा ‘लिखना ज़रूरी है’ और मैंने पलकें झपकते हुए ख़ुद से कहा हाँ मेरा ‘लिखना ज़रूरी है’ |

कभी आंधी पिक्चर में संजीव कुमार ने सुचित्रा सेन के लिए गुलज़ार के लफ़्ज़ों को गुनगुनाया था ‘तुम जो कह दो तो आज की रात चाँद डूबेगा नहीं.........रात को रोक लो|

आज जब सूरज ने मेरी बात मान ली थी तो मैंने भी अपने लिए ये गाना गुनगुनाया ‘तुम जो कह दो तो आज सूरज भी  .......................सुबह को रोक लो |

और इसी ख़ुशफ़हमी के साथ एक ग़ज़ल डायरी में दर्ज हुई |

क्यों कि कई वाक़ये,हालात,बेचैनी आपके लिखने के सबब होते हैं और आप महसूसते हैं कि हाँ ‘लिखना ज़रूरी है’|


        

नदिया हूँ पर फिर भी रुकने का मन है
चलते चलते आज ठहरने का मन है

काग़ज़ के टुकड़ों पर हाँ और ना लिखकर
झूठी इक उम्मीद में बंधने का मन है



चूड़ी नहीं पहनने पर फिर आज मुझे 
दादी की फटकार से डरने का मन है


मन है सब अच्छा सोचूँ अच्छा देखूँ
एक दफ़ा फिर बचपन चुनने का मन है

हालातों की तपती धूप में देख तुझे
मेरा इक बदली में ढलने का मन है

जीवन की अलमारी के हर कोने में
उम्मीदों के सिक्के भरने का मन है

आओ न निंदिया आँखों की देहरी पर
मीठे मीठे ख़्वाब से मिलने का मन है



  

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाकई बहुत उम्दा लिखा है..काबिले तारीफ़,आपके लेखन की यही विशेषता है जो भी मन में होता है बिना किसी रूपांतरण के लिखती हैं...

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  2. आओ न निंदिया आँखों की देहरी पर की मीठे मीठे ख्वाब से मिलने का मन है..सच ही लिखा है..😊😊

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