रविवार, मार्च 26, 2017

अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये


मेरा ये ख़त घरेलू स्त्रियों के नाम!थोड़ा सा वक़्त निकाल लीजियेगा इसके लिए!

मेरी प्यारी सहेलियों,

बहुत दिनों से कुछ बताना चाहती थी या शायद कहना चाहती थी तुम सब से !
 मैंने अपने घर के अंदर बहुत से प्लांट्स लगा रखें हैं!ज़्यादातर ऐसे हैं जो पानी में भी ख़ूब पनपते हैं !कहीं- कहीं मैंने घर के कोने को एक गाँव सा रूप दे दिया है और वहाँ कुछ इनडोर प्लांट्स रख दिए हैं!कहीं गैस की चिमनी के कोने में छोटे छोटे मिट्टी के,पॉटरी के बर्तनों में पौधे पनपा दिए हैं!
मुझे कई बार ऐसा लगा है दरअसल ये हुआ भी है कि मैं दो-तीन दिन के लिए बाहर गयी और लौट कर आई तो देखा मेरे इन प्लांट्स में से कई के पत्ते पीले हो गए हैं जबकि मेरे पीछे इनकी देखभाल में कोई कसर नहीं रहती!
तब कई बार मैं सोचती हूँ क्या ये मेरे बिना अकेले हो जाते हैं इसीलिए मुरझा जाते हैं ?
मैं इनके पीले पत्ते अलग करती हूँ और इन्हें फिर से हरा भरा बना देती हूँ!

तुम सोचोगी ये भी कोई बात हुई,पौधे हैं मुरझायेंगे ही तुम्हारी याद थोड़ी करेंगे!

लेकिन तुम्हें पता है मैं अपनी इस सोच से ख़ूब ख़ुश होती हूँ और संतुष्ट भी वो इसीलिए कि मुझे ऐसा लगता है कि मैं अपने घर के ज़र्रे ज़र्रे के लिए कितनी ज़रूरी हूँ! इतनी ज़रूरी कि ये पौधे भी मेरे बिन नहीं रह पाते!कितनी संतुष्ट सी हो जाती हूँ मैं ये सोचकर !हम स्त्रियों की ये संतोषी प्रवृत्ति स्त्री विमर्श के ख़ाके का एक कमज़ोर बिंदु माना जाता है लेकिन सच तो ये है यही हमारी ताक़त है!
ख़ैर जब मैं पौधों में ख़ुद का अस्तित्व स्वीकार लेती हूँ तो मैं अपने परिवार के लिए ख़ुद को कितना महत्त्वपूर्ण मानती होऊँगी ये आप अंदाज़ा लगा ही सकते हैं !दरअसल मैं मानती ही नहीं, मैं जानती हूँ कि अपने परिवार की केंद्रबिंदु हूँ !
एक पल के लिए भी ख़ुद को अपने घर से हटा कर देखती हूँ तो घर का ज़र्रा ज़र्रा मुझे पुकारता हुआ सा लगता है !

मेरी सहेलियों,
जब तुमसे कोई पूछता है कि आप क्या करती हैं?तुममें से ज़्यादातर कुछ इस तरह से कहती हैं कि हम तो हॉउस वाइफ़ हैं बस!

कई बार मैंने इस बस कहने में अनंत ख़ालीपन महसूस किया है तुममें!लगता है जैसे कि तुम्हारे हाउस वाइफ़ होने के कोई मायने ही नहीं!हाँ अक्सर ये होता होगा कि जब तुम्हारे पति तुमसे ये कहते होंगे 'आख़िर तुम करती ही क्या हो घर में,हमें देखो कितनी मेहनत करते हैं '!
कितनी बार ऐसा भी तुमने सुना होगा 'अरे जॉब क्यों नहीं की ?तुम तो पढ़ी लिखी थीं फिर भी घर बैठी हो'!

एक बात और याद आयी अभी एक भजन संध्या में मुझे अपनी एक परिचित मिलीं मैंने उनसे कहा 'भाभी जी, बड़े दिनों बाद दिखीं आप! वो बोलीं 'हाँ, ऐसे कहीं आ जाती हूँ या जब ये साथ हों तब कहीं चली जाती हूँ !किटी विटी इनको पसन्द नहीं इसीलिए ज्वाइन नहीं की! अब देखो सोना ,इनके विपरीत तो नहीं चल सकती न ,और ये कहते हैं कि एक बार औरत की ज़ुबान खुल जाए और क़दम घर से निकल जाए तो फिर वो रूकती नहीं '!ये कहते हुए उन्हें गर्व हो रहा था कि देखो कितनी पतिव्रता स्त्री हूँ मैं !मैं हैरान भी थी और दुःखी भी उनकी इस सोच पर !
ख़ैर ये तो उन स्त्रियों की बात है जो अपने अस्तित्व के प्रति जागरूक नहीं हैं या कह लीजिये उनके अंदर वैचारिक शून्यता है !
लेकिन जो स्त्री अपने अस्तित्व को कहीं से कमतर नहीं मानती लेकिन परिस्तिथियाँ जहाँ उसका परिवार उसके घर के लिए किये गए काम या समर्पण को कोई महत्त्व नहीं देता या समाज की सोच कि 'हाउस वाइफ़ से एक कामकाजी स्त्री थोड़ी ज़्यादा सुपीरियर है' उसे अंदर ही अंदर कुंठाग्रस्त बना देती हैं !परिणामस्वरूप उसकी सोच ये हो जाती है 'हम तो हाउस वाइफ़ हैं बस'!
स्त्री चाहें कामकाजी हो या हाउस वाइफ,ग्रामीण हो या शहरी,संपन्न परिवार की हो या अन्य स्तर के परिवार की! दरअसल हर क्षेत्र में,हर रूप में वो आज भी पुरुषों से कमतर आँकी जाती है!
स्वतंत्र होकर भी परतंत्र,निरीह,वंचित,शोषित!

इस विषय पर तो बहुत कुछ लिखा जा सकता है बहुत कुछ सुझाया जा सकता है लेकिन आज मैं अपनी जिन सहेलियों से मुख़ातिब हूँ ये वही हैं जो समाज की सबसे प्राथमिक इकाई यानि परिवार को सुदृढ़ नींव देती हैं ,एक मकान को घर बनाती हैं ,एक पुरुष की अर्धांगनी बनकर उसे पूर्ण बनाती हैं,अपनी कोख़ से उसका और अपना अंश जन्मती हैं !

मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ कि मैं एक ऐसे परिवार में ब्याही हूँ जहाँ स्त्रियों पुरुषों में कोई अंतर नहीं!पति को ख़ुद से सुपीरियर समझने का कोई चलन नहीं हमारे यहाँ !मैंने अपनी ख़ुशी से नौकरी नहीं की,मुझे नहीं करनी थी इसीलिए नहीं की !मेरे पति कूपमंडूक नहीं, कभी नहीं कह सकते कि तुम करती क्या हो घर में,या तुमने किया ही क्या है आख़िर ,मुझे देखो मैं कितना कुछ करता हूँ....इस तरह का कुछ!

लेकिन यदि इस तरह का कोई भी प्रश्न या हालात मेरे सामने आते हैं! तो मुझमें माद्दा है कि मैं बता, जता सकूँ कि मैं कितनी ज़रूरी हूँ उनके लिए,परिवार के लिए!

लेकिन मेरी सहेलियों ऐसा जवाब आप तब दे पायेंगी जब आप स्वयं ख़ुद को स्वीकारेंगी!जिस दिन आपने ख़ुद को पहचान लिया,स्वीकार लिया फिर किसकी हिम्मत जो आपके वुजूद को हल्के में ले!
क्यों कि जहाँ रौशनी होती है फिर वहाँ सिर्फ़ रौशनी ही होती है!

अभी पिछले दिनों की ही तो बात है जब मुझे अपनी  एक दोस्त के अंदर एक घरेलू स्त्री होने की हीनता नज़र आई मैंने उस वक़्त उसे उसकी इम्पॉर्टेन्स हल्के फुल्के ढंग से बतलाई लेकिन उसी समय सोचा कि अपना मन फेसबुक पर ज़रूर साझा करुँगी क्यों कि मेरे जो पाठक हैं उनमें से कई स्त्रियाँ ऐसी होंगी जो इस तड़पन से गुज़र रही होंगी !
भारतीय समाज में ज़्यादा प्रतिशत ऐसी स्त्रियों का है जिनके होने को उतना स्वीकार नहीं किया गया जितना  किया जाना चाहिए था!

हमें पुरुष से बराबरी नहीं करनी,करनी भी नहीं चाहिए! पुरुष पुरुष है हम हम हैं !

एक कविता ने उसी दिन मेरे मन में जन्म लिया था जिस दिन अपनी दोस्त को उदास देखा था!उसे शेयर कर रही हूँ !

मेरी दोस्तों इसे पढ़ियेगा और उससे भी ज़्यादा गुनियेगा!

सभी स्त्रियों से मेरी ये गुज़ारिश!

आपकी
सोनरूपा

!!अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!!

सृष्टि का आधार हैं,संरचनाएँ हैं
जीवन की इंद्रधनुषी छटाएँ हैं
धूप में छाँव देने वाली प्रथाएँ हैं
त्याग,तप,शौर्य, धैर्य की कथाएँ हैं
रिश्तों को संजोने वाली सभ्यताएँ हैं
हम भोर सी पुनीत भावनाएँ हैं

इसलिए काम ये ज़रूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

ज़िन्दगी को जन्म देने के सुभागी हम
घर के ज़र्रे ज़र्रे के अनुरागी हम
प्रेम,त्याग,ममता के अनुगामी हम
मन की कठोरता के प्रतिगामी हम
चाँद पर भी क़दम रख आये हैं
हिम आलय की बर्फ़ चख आये हैं
गर्व ख़ुद पर बदस्तूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

नदिया की धार कभी मुड़ती नहीं
बेगवान वायु कभी रूकती नहीं
पर्वतों की श्रृंखलाएं झुकती नहीं
जोश भरी वाणी कभी घुटती नहीं
आप किसी से भी कमज़ोर नहीं हैं
आँसू भरे नयनों की कोर नहीं हैं

मन से समस्त भ्रम दूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

पिता,पति,पुत्र का प्रशासन सहें
भीतर भीतर रोज़ ख़ुद को दहें
कब तक सबके आदेशों को सुनें
ज़िन्दगी को अपने तरीक़े से जियें
बहुत हुआ ये शोषण का सिलसिला
क़िस्मत से न अब कीजिये  गिला

शिक्षा से ये अन्धकार दूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

अपने हितों के प्रति मुखर बनें
स्वाभिमान वाला नेक रास्ता चुनें
अपसंस्कृति की आग में न पिघलें
आत्मसंयम वाली न राह बदलें
सत्य है स्वछंदता स्वतंत्रता नहीं
इसकी आज़ादी से कोई समता नहीं

फ़ैसले करें तो बाशऊर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!

शोकेस में रक्खी आप गुड़िया नहीं
मोम की बनी हुई गुजरिया नहीं
आँसू बहाती हुई बदरिया नहीं
लाज को ढोने वाली चुनरिया नहीं
आप गर सीता सती सा विचार हैं
आप रणचंडी का भी अवतार हैं

हौसलों को ऊँचा भरपूर कीजिये
अपने वुजूद पे ग़ुरूर कीजिये!


सोनरूपा
22 मार्च


सोमवार, फ़रवरी 13, 2017

'यहाँ मज़बूत से मज़बूत लोहा टूट जाता है
कई झूठे इकठ्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है '

एक पत्रिका के लिए नामवर शायर 'हसीब सोज़'जी के ग़ज़ल संग्रह 'अपनी ज़मीन से' का मजमून(समीक्षा) लिखने का अवसर मिला!यहाँ भी शेयर कर रही हूँ!

!! हिंदुस्तानी ज़बान के शायर : हसीब सोज़!!

साहित्य की कोई भी विधा क्यों न हो उसने अपने समय की ज़िन्दगी को अपने-अपने तौर पर पेश किया है !

ज़माने के रंग ,तौर तरीक़े ,विसंगतियाँ ,दिल के जज़्बात की सटीक अभिव्यक्ति है हसीब सोज़ साहब की शायरी !

आत्मचिंतन और ख़ुद से मुठभेड़ के बाद उनकी कलम से निसृत शायरी वो वितान रचती है कि महसूस हो हाँ,यहाँ तो हमारे मन बात है !

एक कलमकार का सबसे बड़ा हासिल ये होता है कि वो अपनी शिनाख़्त हासिल कर ले !सैकड़ों पत्र-पत्रिकाओं ,सोशल साइट्स पर ग़ज़लें   पढ़कर कभी-कभी इक शाइर का ये मिसरा मन में कौंधता है-
’कब तलक सुनते रहें हम एक जैसी गुफ़्तगू’ 
लेकिन अगर हसीब सोज़ जी को पढ़ा जाए तो आप उनके संग्रह ‘अपनी ज़मीन से’ की पहली ग़ज़ल से लेकर आख़िरी ग़ज़ल तक बस हसीब सोज़ को ही पायेंगे किसी और का ध्यान भी आपके ज़ेहन के आसपास से नहीं गुजरेगा ! संग्रह की पीठ पर नामवर कवि,ग़ज़लकार प्रदीप चौबे जी की राय है जो हसीब सोज़ जी की शायरी पर बिलकुल सटीक है !

दरअसल अंतर्मन का नाद हो या बाहरी जीवन का कोलाहल ग़ज़ल को ग़ज़ल ही होना होता है! ग़ज़ल रेत सी ख़ुश्क नहीं,भावनाओं का पठार नहीं ये वो विधा है जिसमें मन की ध्वनियाँ हैं तो बाहरी समाज का कोलाहल भी और इन  सब के बीच इसमें लफ़्ज़ों की लोच ,हर्फों की बरतने का सलीका भी सध जाए तब ग़ज़ल ग़ज़ल होती है ! ग़ज़ल के शिल्प में जितनी शिल्प की बाध्यता ज़रूरी है उतना ही ज़रूरी कथ्य का बिम्बात्मक और प्रतीकात्मक प्रस्तुतिकरण!

कुछ शेर देखिये- 
मैं टाटा बिड़ला से आगे निकलना चाहता हूँ 
तू एक रात ठहर जा ग़रीबखाने में 

वो किस मज़े से हवा में उड़ा रहा है मुझे 
मैं एक बूँद हूँ दरिया बता रहा है मुझे 

किसी के साथ हमने वो भी दिन बरबाद कर डाले 
कि जब मिट्टी उठा लेते तो सोना हो गया होता

प्रख्यात कवि डॉ उर्मिलेश का कहना है ‘ग़ज़ल को अख़बार होने से बचाया जाए,ग़ज़ल का हर शेर अपने समय की ख़बर दे या उस ख़बर से हमें परोक्षत: ख़बरदार करे ,यह तो चलेगा लेकिन वह अख़बार की हद चला जायेगा तो वह शेर नहीं रह जायेगा’!
और हसीब सोज़ जी की शायरी की ख़ासियत है कि हर शेर अपने आप में एक पूरा कथानक है रवानगी नदी की लहर सी ,लफ़्ज़ों को बरतने का सलीक़ा कमाल का , कहीं सपाटबयानी नहीं !


रवायती शायरी अब गुज़रे ज़माने की बात है !लोग अब उर्दू-हिन्दी की डिक्शनरी खोलकर अर्थ खोजना नहीं चाहते !’शब्दों में किफ़ायत बरतने की कला ,कसापन,कम शब्दों में गहरी और असरदार बात और कोटेबल शेर’ इन मायनों में हसीब सोज़ जी की शायरी खरी उतरती है उनके कुछ शेर ख़ूब उद्घृत किये जाते हैं !उनके शेर आम आदमी की आवाज़ हैं !

तअल्लुक़ात की क़ीमत चुकाता रहता हूँ
मैं उसके झूठ पे भी मुस्कुराता रहता है 

तिरी मदद का यहाँ तक हिसाब देना पड़ा
चराग़ ले के मुझे आफ़ताब देना पड़ा 

बीड़ी  सिग्रेट के धुएँ भी ज़ाफ़रानी हो गये 
लोग दौलत की बदौलत ख़ानदानी हो गये 

ये रस्मी जुमला हमेशा रिपीट होता है 
हज़ार ख़ूबियाँ थीं आह मरने वाले में 

देख ले तेरी सख़ावत किस क़दर मशकूक है 
ये भिकारी भीक का बर्तन भी छोटा लाये हैं 

स्वार्थपूर्ति  हेतु अपने स्वाभिमान को ताक पर रख रास्ता बनाना ज़माने का शगल हो गया है ऐसे में सोज़ साहब की ग़ज़लों से गुज़रते हुए हम एक अना पसंद व्यक्तित्व से मिलते हैं-  

अगर शर्तों पे मिलता है तो दरिया छोड़ देता हूँ 
मैं अपने आप को हर रोज़ प्यासा छोड़ देता हूँ 
सामाजिक जीवन की विद्रूपताएँ देखिये -

शायद मुआफ़ पिछली ख़ताएँ नहीं हुईं 
मरने के बाद शोक सभाएं नहीं हुईं 

कोई कमाल था न हम में कोई ख़ूबी थी 
ये दुनिया कैसे हमारी मुरीद हो जाती 

आज ज़िन्दगी से सुकून के पल इस क़दर गुम हो रहे हैं कि स्तिथि ये हो जाती है – 

कहीं तनाव की सीमा न इतनी बढ़ जाए 
कि ख़ुदकुशी भी किसी रोज़ करनी पड़ जाए 
  
रात दिन सबको कोई काम लगा रहता है 
शहर में चारों तरफ जाम लगा रहता है

कुछेक शेर अलग रंग के भी पढ़िए जिन्हें पढ़ कर बरबस चेहरे पर मुस्कान आ जाती है –

कई दिनों के लिए उसको देख लेता हूँ 
वो इत्तिफाक़ से जब भी गली में मिलता है

हम तो इस शर्त पे भी देखने आये हैं तुझे 
अंधे हो जायेंगे जिस वक़्त नज़ारा होगा   

एक ज़िम्मेदार कलम स्व से सर्व की यात्रा तय करती है !हसीब सोज़ जी की शायरी ये ज़िम्मेदारी बखूबी निभाती है !वो पत्र पत्रिकाओं जितने चाव से पढ़े जाते हैं उतने ही मुशायरों में भी पसंद किये जाते हैं उनके यहाँ मंच और किताब में कोई फ़ासला नहीं !  
हिन्दी ग़ज़ल  उर्दू ग़ज़ल के झगड़े ने ग़ज़ल की आत्मा को आहत किया है और ऐसे में हसीब सोज़ जी की ग़ज़लों  का सुखद पहलू ये है कि उनका लहजा वो है जो हिन्दुस्तानी आवाम का लहजा है !अपनी ग़ज़लों के बारे में उनका जो कहना है वो मेरे लिखे जाने से ज़्यादा आपको उनका नज़रिया जानने का मौक़ा देगा –
‘अपनी ज़मीन से’ में अपनी शायरी के बाबत वो क्या कहते हैं पढ़िए –

‘लव लेटर में स्पेलिंग की नहीं बल्कि लफ़्ज़ों का अर्थ मायने रखता है ,शायरी की सच्ची तारीफ़ यही है कि कान सुने और दिल महसूस करे और ऐसा उस वक़्त संभव है जब दिल की बात दिल से कही जाए !हिन्दी शायरी –उर्दू शायरी ,यह दो ज़बानों का मतभेद नहीं बल्कि दो ज़हनों की अपनी ज़िद है !मेरे ख़याल में ये काम तब और भी आसान हो जाता है जब हम हिन्दुस्तानी ज़बान इस्तेमाल करें हिंदुस्तानी ज़बान का मतलब है जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक बोली भी जाती है,समझी भी जाती है ,जिसकी पीठ पर न कोई हिन्दी का ठप्पा है न उर्दू का !आसान लफ़्ज़ों में अवामी गुफ़्तगू ही शायरी का सबसे बड़ा कमाल है !वह शेर ज़िन्दा रहता है जो याद रहता है’ !

और हसीब सोज़ जी की शायरी वाक़ई अपने हर पाठक को याद रह जाने वाले शायरी है और ये पाठक और रचनाकार दोनों की ही ख़ुशनसीबी है!

-सोनरूपा विशाल

【संग्रह के लिए सम्पर्क करें-हसीब सोज़-9720735172】